परमार्थ निकेतन में स्वामी चिदानन्द सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती के पावन सान्निध्य में भारत की पहली “माँ शबरी रामलीला” का शुभारम्भ किया गया। सैस फाउंडेशन और सुरेन्द्र बक्शी आरोग्य सेवा फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने दीप प्रज्वलन कर इस अनूठे आयोजन की शुरुआत की। यह रामलीला विशेष रूप से वनवासियों, जनजातियों और आदिवासियों की संस्कृति, आस्था और जीवन-मूल्यों को समर्पित है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि माँ शबरी का जीवन त्याग, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने प्रेम और निष्ठा से भगवान राम को जूठे बेर अर्पित किए और इसी भक्ति में अद्वितीय माधुर्य पाया। यह रामलीला केवल नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि आदिवासी और वनवासी परंपराओं का पुनराविष्कार है, जो प्रकृति, संस्कृति और अध्यात्म को जोड़ती है।
साध्वी भगवती सरस्वती ने इसे नारी भक्ति और जनजातीय चेतना का उत्सव बताते हुए कहा कि माँ शबरी की कथा हमें सरलता, प्रेम और भक्ति के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
सैस फाउंडेशन के अध्यक्ष और पदाधिकारी कलाकारों को अंगवस्त्र और रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया। कोलकाता से आए अतिथि श्री सुधीर जालान और श्रीमती अलका जालान ने भी इस आयोजन में आशीर्वाद दिया।
यह रामलीला भारतीय संस्कृति की समरसता और समर्पण को प्रदर्शित करने वाला ऐतिहासिक पहल है, जिसमें हर व्यक्ति की भक्ति और निष्ठा का सम्मान प्रमुख है।
Reported By: Arun Sharma












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