करौली स्थित प्राचीन शंकर महादेव मंदिर से श्री करौली शंकर महादेव जी का परमार्थ निकेतन आगमन हुआ, जहाँ उन्होंने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य में विश्वविख्यात गंगा आरती में विशेष सहभाग किया। इस अवसर पर आध्यात्मिक उन्नति, साधना और जीवन की समसामयिक चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा हुई।
स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि करौली का शंकर महादेव मंदिर मात्र एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि साधना, सिद्धि और आत्मिक उत्थान का केंद्र है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आधुनिक समय में जहाँ बुद्धि और भौतिक प्रगति बढ़ रही है, वहीं मन और आत्मा की शुद्धि कम होती जा रही है। उनके अनुसार जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि प्रसन्नता, संतोष और आंतरिक शांति का अनुभव है, न कि केवल धन या पद।
भज गोविन्दम् के श्लोक कस्त्वं कोऽहम्… की व्याख्या करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप और ईश्वर को पहचानना आवश्यक है। बाहरी सुख-साधनों में उलझकर जीवन की सच्ची अनुभूति अधूरी रह जाती है। जब हम अहंकार, मोह और भ्रम से मुक्त होते हैं, तभी वास्तविक ज्ञान और शांति प्राप्त होती है।
श्री करौली शंकर महादेव जी ने भी साधना के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डाला और कहा कि आत्मा की जागृति ही जीवन को सार्थक बनाती है। उन्होंने भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि सच्ची सिद्धि आत्मिक जागरूकता, संतोष और प्रसन्नता में निहित है।
इस अवसर पर स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने महात्मा ज्योतिबा फुले जी की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए कहा कि फुले दंपति ने शिक्षा, नारी-सशक्तीकरण और सामाजिक समता की लौ जगाई, जो आज भी भारत के लिए प्रेरणादायी है।
आखिर में स्वामी जी ने श्री करौली शंकर महादेव जी को रुद्राक्ष का पौधा भेंट कर सम्मानित किया और इस आध्यात्मिक यात्रा को अद्भुत एवं अविस्मरणीय बताया।
Reported By: Arun Sharma












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