हिमालय की उत्तुंग शिखरों पर विराजमान बद्री विशाल और समुद्र की अनंत गर्जना के बीच बसे जगन्नाथ धाम की यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरियों को नापना नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक आत्मा के दो छोरों को एक सूत्र में पिरोना है। हाल ही में पीआईबी (प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो) देहरादून द्वारा आयोजित ओडिशा के ‘मीडिया एक्सपोजर टूर’ ने एक पत्रकार और लेखक के रूप में मुझे उस सत्य से रूबरू कराया, जो उत्तर और पूर्व के इन दो महातीर्थों को भूगोल और भक्ति के अनूठे मेल से जोड़ता है। उत्तराखंड के चमोली में जहाँ अलकनंदा के पावन तट पर भगवान बद्री विशाल योग मुद्रा में विराजे हैं, वही अलकनंदा जो आगे चलकर देवप्रयाग में गंगा का रूप लेती है, मानो उत्तर का संदेश लेकर पूर्व की ओर प्रस्थान करती है। भूगोल का यह विस्मयकारी सत्य देखिए कि हिमालय की गोद से निकलने वाली यही गंगा अंततः बंगाल की खाड़ी के उसी अगाध सागर में विलीन होती है, जिसके तट पर नीलांचल धाम में भगवान जगन्नाथ अपनी लीला रचते हैं। उत्तर से पूर्व की ओर बहती नदियाँ केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि बद्रीनाथ के संयम को जगन्नाथ के उत्सव से जोड़ने वाली एक अदृश्य कड़ी हैं।
जहाँ बद्रीनाथ छह महीने की कठिन शीतकालीन समाधि के बाद खिलता है और भक्त दुर्गम पहाड़ों, कड़ाके की ठंड और संकरी रास्तों की ‘तपस्या’ कर वहां पहुँचता है, वहीं पुरी का जगन्नाथ मंदिर साल के 365 दिन अपने भक्तों के लिए बाहें पसारे खड़ा रहता है। पुरी की इस यात्रा में जो सबसे पहली चीज़ मन को झकझोरती है, वह है वहां का जनसमुद्र। सामान्य दिनों में भी जहाँ औसतन 1 से 1.5 लाख श्रद्धालु दर्शन करते हैं, वहीं सप्ताहांत पर यह संख्या भक्ति के एक ऐसे सैलाब में बदल जाती है जिसे संभालना कठिन हो जाता है। सुबह 6:00 से दोपहर 12:00 बजे के बीच ही लाखों लोग दर्शन कर चुके होते हैं और वीआईपी दर्शनार्थियों की कतार ही कई बार 10,000 की संख्या को पार कर जाती है। बद्रीनाथ में जो शांति, एकांत और मौन का महत्त्व है, उसके उलट पुरी में भक्ति का एक ऐसा कोलाहल है जिसमें भक्त स्वयं को भूल जाता है। कत्यूरी शैली की वास्तुकला वाले बद्रीनाथ और कलिंग शिल्प के बेजोड़ नमूने जगन्नाथ मंदिर के बीच का यह अंतर हमें भारत की विविधता के दर्शन कराता है।
किंतु इस भव्यता और अपार जनसमूह के बीच आस्था का एक स्याह पक्ष भी हृदय को कचोटता है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, जगन्नाथ धाम के आंगन में ‘पंडा संस्कृति’ पर लोभ का रंग गहरा होता जा रहा है। एक पत्रकार के रूप में जब मैंने देखा कि छोटे-छोटे लघु मंदिरों में श्रद्धा के नाम पर पैसे की मांग एक मजबूरी बन गई है, तो मन आहत हुआ। भीड़ की धक्का-मुक्की के बीच जब एक पांडा सिर्फ इसलिए भक्त की कलाई पकड़ ले कि उसने सिंदूर या चूड़ियां बिना पैसे दिए उठा लीं, तो मर्यादा की सीमाएं खंडित होती दिखती हैं। क्या भगवान के द्वार पर कृपा अब ‘टैक्स’ के रूप में वसूली जाएगी? बद्रीनाथ में भी पांडों की परंपरा है, लेकिन वहां आज भी वह सादगी और शालीनता शेष है जहाँ भक्त को अपमानित नहीं होना पड़ता। पुरी में वह स्थिति पीड़ादायक हो जाती है जब किसी श्रद्धालु को ₹100 के लिए हाथ फैलाना पड़े या उधारी मांगकर भगवान के द्वार पर ‘वसूली’ चुकानी पड़े। आखिर ये पंडे इतना धन कहाँ ले जाएंगे? क्या जगन्नाथ जी की कृपा केवल नोटों के वजन से मापी जाएगी?
हिमालय की नदियां जब सागर में मिलती हैं, तो वे अपना अहंकार त्याग देती हैं, लेकिन इन धामों में बैठे कुछ सेवादार शायद अपना मोह नहीं त्याग पा रहे। बद्रीनाथ उत्तर का मस्तक है, तो जगन्नाथ पूर्व का हृदय; एक हमें चढ़ाई और संयम सिखाता है, तो दूसरा असीमित करुणा। लेकिन इस करुणा के बीच पनपता बाजारीकरण हमारी आध्यात्मिक नींव को खोखला कर रहा है। समय आ गया है कि इन महातीर्थों की पवित्रता को पांडों के लालच से मुक्त कराया जाए। मंदिर केवल पत्थरों के ढांचे या पर्यटन के केंद्र नहीं हैं, वे उस विश्वास के स्तंभ हैं जहाँ एक गरीब भक्त भी बिना डरे अपनी झोली फैला सके। यदि धर्म के रक्षक ही पैसों के भक्त हो जाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इन धामों से शांति नहीं, बल्कि कड़वाहट लेकर लौटेंगी। आस्था को बाज़ार बनने से बचाना ही आज की सबसे बड़ी राष्ट्र सेवा है, ताकि गंगा के उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी तक का यह आध्यात्मिक मार्ग निष्कलंक बना रहे।
Reported By: Shishpal Gusain














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