देहरादून। परम पूज्य संस्कार प्रणेता, ज्ञानयोगी, जीवन आशा हॉस्पिटल प्रेरणा स्तोत्र और उत्तराखंड के राजकीय अतिथि आचार्य श्री 108 सौरभ सागर जी महामुनिराज के पावन सान्निध्य में आज 24 जुलाई की प्रातः 6:15 बजे से जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक और शांतिधारा विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न हुई। इसके पश्चात संगीतमय कल्याण मंदिर विधान का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने 23वें तीर्थंकर चिंतामणि भगवान पार्श्वनाथ की आराधना अत्यंत भावपूर्ण ढंग से की।
आज के पुण्यार्जक देहराखास परिवार रहे। वहीं, बाहर से पधारे गुरुभक्तों का पुष्प वर्षा योग समिति द्वारा स्वागत व अभिनंदन किया गया।

अपने प्रवचन में पूज्य आचार्य श्री ने कहा, “देहरी को लांघ कर ही भगवान मिलते हैं। हम अकसर पर्याय मूढ़ में जीते हैं। भगवान के भामण्डल में इतनी शक्ति है कि वे सात भवों का ज्ञान रखते हैं। उन्होंने पूजा के तीन स्वरूप — सचित पूजा, अचित्त पूजा और सदेचाचित पूजा — पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के युग में पूजा के स्थान पर दिखावे के भाव अधिक हो गए हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि जब हम किसी के साथ होते हैं, तो हमारे भाव भी बदलते हैं — जैसे रसोई में परिवार के स्वास्थ्य की भावना, पूजन में शुद्ध भाव — लेकिन सोशल मीडिया और प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने पूजा को भी नाटक का रूप दे दिया है। भगवान महावीर का संदेश है कि भामण्डल के पास आकर स्वयं को देखो, और भीतर की चेतना को जागृत करो।
यह आध्यात्मिक आयोजन न केवल भक्तों के लिए प्रेरणादायक रहा, बल्कि जीवन को सही दिशा में मोड़ने का भी संदेश लेकर आया।
Reported By: Shiv Narayan












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