राज्यसभा सांसद डॉ. नरेश बंसल ने वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर सदन में गीत की ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी महत्ता को भावपूर्ण शब्दों में रेखांकित किया। उन्होंने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को नमन करते हुए कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, क्रांतिकारियों की ऊर्जा और भारत माता के प्रति अटूट भक्ति का महामंत्र है।
डॉ. बंसल ने अपने संबोधन में वंदे मातरम को भारत के गौरव, स्वाभिमान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह गीत अतीत के त्याग, संघर्ष और बलिदान का अमर दस्तावेज़ है। उन्होंने कहा कि यह मंत्र क्रांतिकारियों के मन में हुंकार बनकर गूंजता था और आज भी राष्ट्रीय चेतना का आधार है।
उन्होंने वंदे मातरम के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि 1875 में लिखे गए इस गीत को 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार गाया था और 1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर बन गया। उन्होंने 1975 के आपातकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वर्ण जयंती के समय प्रतिबंधों के बावजूद उन्होंने साथियों के साथ वंदे मातरम का कार्यक्रम आयोजित कर अधिनायकवाद के खिलाफ आवाज उठाई।
डॉ. बंसल ने कहा कि जिस गीत ने आज़ादी की लड़ाई में देश को एक सूत्र में पिरोया, उसे तुष्टिकरण की राजनीति के चलते कमजोर करने का प्रयास हुआ, जिसका परिणाम देश के बंटवारे तक के रूप में सामने आया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम भारत माता की आराधना और पीढ़ियों की साधना है, और यह राष्ट्र चेतना का अमर मंत्र है।
Reported By: Arun Sharma












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