
लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव–2026 के तीसरे दिन हिंदी, भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर व्यापक विमर्श हुआ। इस दौरान हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल कराने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया। देश-विदेश से पहुंचे साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषाविदों ने हिंदी के वैश्विक विस्तार, भारतीय भाषाओं के संरक्षण तथा शिक्षा, प्रशासन, सिनेमा, मीडिया और डिजिटल माध्यमों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग पर जोर दिया।
कार्यक्रम में योगऋषि एवं पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्वामी रामदेव, प्रख्यात कवि पद्मश्री डॉ. अशोक चक्रधर, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ सहित कई अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के साथ होना चाहिए।
स्वामी रामदेव बोले- अपनी भाषा के सम्मान से बढ़ता है राष्ट्रीय आत्मविश्वास
स्वामी रामदेव ने लेखक गाँव की सराहना करते हुए कहा कि वह पहली बार यहां आए हैं और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के स्नेह ने उन्हें इस सुंदर परिसर तक खींच लाया। उन्होंने लेखक गाँव को साहित्य, संस्कृति और प्रकृति के प्रति समर्पण का उदाहरण बताया। साथ ही कहा कि डॉ. निशंक के व्यक्तित्व में हिमालय के जल, जंगल, जीवन और पर्यावरण के प्रति विशेष प्रेम दिखाई देता है।
स्वामी रामदेव ने कहा कि हिंदी के प्रति जन-जन में प्रेम जगाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हिंदी में कार्य करने तथा भाषा को प्रोत्साहित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा के प्रति सम्मान राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार है।
उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए हिंदी और भारतीय संस्कृति की गहराई को जानने के लिए संस्कृत से जुड़ना आवश्यक है। भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक जड़ों के प्रति सम्मान से ही भारत को विश्व में श्रेष्ठ स्थान दिलाने का संकल्प साकार हो सकता है।
डॉ. अशोक चक्रधर ने भारतीय भाषाओं की एकता पर दिया जोर
सुप्रसिद्ध कवि एवं पद्मश्री डॉ. अशोक चक्रधर ने हिंदी और भारतीय भाषाओं की एकता तथा देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की समृद्ध परंपरा दी है। हिंदी का सम्मान अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने हिंदी को व्यापक जनसंवाद की सशक्त कड़ी बताते हुए हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने के प्रस्ताव के समर्थन में सामूहिक संकल्प लेने का आह्वान किया। वहीं, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे ने इस पहल की सराहना करते हुए विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों से हिंदी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिष्ठा मिलेगी।
प्रवासी भारतीयों और सिनेमा ने हिंदी को दिलाई वैश्विक पहचान
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि हिंदी अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो सहित अनेक देशों में प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच हिंदी सांस्कृतिक संपर्क की महत्वपूर्ण भाषा बनी हुई है। सिनेमा, फिल्म-संगीत, मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने भी हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में भूमिका निभाई है।
स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय के भारतविद् प्रो. डॉ. हाइंस वर्नर वेसलर ने हिंदी में अपने विचार रखते हुए कहा कि विदेशी विद्यार्थियों के लिए हिंदी शिक्षण को अधिक व्यावहारिक और समकालीन बनाया जाना चाहिए। विदेशों में हिंदी के साथ भारतीय संस्कृति और साहित्य का अध्ययन भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए निरंतर कूटनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।
ऑस्ट्रेलिया से आए अभिनेता, एंकर एवं सांस्कृतिक अध्येता चार्ल्स थॉमसन ‘बिहारी लाल’ ने ‘जय भारत, जय हिंदी’ के उद्घोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए मातृभाषाओं के प्रति सम्मान और आत्मविश्वास जरूरी है। उन्होंने शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
बुल्गारिया के सोफिया विश्वविद्यालय की लेखिका एवं इंडोलॉजी की प्रोफेसर मौना कौशिक ने कहा कि दुनिया के अनेक देशों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। अब जरूरत है कि हिंदी अकादमिक संस्थानों से आगे बढ़कर जन-जन की भाषा बने। उन्होंने साहित्यिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए हिंदी का वैश्विक विस्तार करने पर जोर दिया।
डॉ. निशंक बोले- हिंदी का संवर्धन प्रत्येक भारतीय की जिम्मेदारी
लेखक गाँव के संस्थापक एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने सभी वक्ताओं के विचारों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी का संरक्षण और संवर्धन प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में संबोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा को बढ़ावा मिला है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित अन्य जनप्रतिनिधियों की ओर से हिंदी में आधिकारिक कार्यों को प्रोत्साहित किए जाने का भी उल्लेख किया।
डॉ. निशंक ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का काम करती है और विविध भाषायी समुदायों को जोड़कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाती है। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके सम्मान, संरक्षण और समृद्धि के साथ होना चाहिए।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए व्यापक जनसमर्थन, अंतरराष्ट्रीय संवाद और संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि लेखक गाँव साहित्य, संस्कृति, प्रकृति और भारतीय ज्ञान परंपरा का संगम है, जो हिंदी और भारतीय भाषाओं को वैश्विक मंच उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
देश-विदेश के साहित्यकारों ने किया प्रस्ताव का समर्थन
वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी ने हिंदी के संरक्षण, संवर्धन और विकास के लिए योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता बताई। ब्रिटेन के कथाकार एवं एमबीई सम्मान से अलंकृत तेजेंद्र शर्मा ने कहा कि हिंदी को उसका अपेक्षित स्थान दिलाने के लिए शांतिपूर्ण, तार्किक और सकारात्मक जनजागरण जरूरी है। उन्होंने समाज और जनप्रतिनिधियों के बीच हिंदी के महत्व पर व्यापक संवाद का आह्वान किया।
नीदरलैंड से आए रमा तक्षक ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रस्ताव पर विचार रखे। अंडमान से आईं तमिल भाषाविद् डॉ. एन. लक्ष्मी और मिजोरम से पहुंचे प्रो. सुशील शर्मा ने भी प्रस्ताव के प्रति समर्थन व्यक्त करते हुए भारतीय भाषाओं के बीच सहयोग और सांस्कृतिक एकता पर जोर दिया।
लेखक गाँव की निदेशक विदुषी निशंक ने अतिथियों, साहित्यकारों और विद्वानों का स्वागत करते हुए हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प से जुड़ने की अपील की।
हिंदी के वैश्विक विस्तार के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर
लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव के तीसरे दिन हुए विमर्श में हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा, भारतीय भाषाओं के समन्वय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने का संदेश दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी का प्रभाव उसके व्यावहारिक प्रयोग, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, साहित्यिक समृद्धि और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बढ़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए कूटनीतिक प्रयासों के साथ जनभागीदारी और शैक्षिक संस्थानों की सक्रिय भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया। महोत्सव में हिंदी के विस्तार के साथ भारत की भाषायी विविधता को संरक्षित रखने और सभी भारतीय भाषाओं को समान सम्मान देने की भावना प्रमुखता से सामने आई।
Reported By: Arun Sharma













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