राज्य में भालुओं के हमलों की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे भालुओं के हाइबरनेशन (शीत–निद्रा) चक्र में आ रहा बदलाव एक प्रमुख कारण है। सामान्य परिस्थितियों में सर्दियों में भालू भोजन की कमी और अत्यधिक ठंड से बचने के लिए शीत–निद्रा में चले जाते हैं, लेकिन बदलते पर्यावरणीय हालात इस प्राकृतिक प्रक्रिया को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान का अध्ययन
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने कुछ वर्ष पूर्व जम्मू–कश्मीर में भालुओं पर अध्ययन किया था। इस अध्ययन के दौरान 7 भालुओं पर रेडियो कॉलर लगाए गए थे। अध्ययन में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए:
औसतन भालू 65 दिन शीत–निद्रा में रहे।
अलग-अलग भालुओं का हाइबरनेशन समय अलग पाया गया—
कुछ भालुओं ने 90 दिन तक शीत–निद्रा ली
जबकि कुछ मात्र 40 दिन ही हाइबरनेशन में रहे
कश्मीर में सेब व चेरी के बागानों के आसपास भालू–मानव संघर्ष की घटनाएं अधिक रिकॉर्ड हुईं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि सभी भालू शीत–निद्रा में नहीं जाते। तापमान, भोजन की उपलब्धता और क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी इसे प्रभावित करती है।
उत्तराखंड में वन विभाग का अध्ययन
राज्य में भालू हमलों में बढ़ोतरी के बाद वन विभाग ने भी इस पर अध्ययन किया था।
डीएफओ चकराता वैभव कुमार के अनुसार, वर्ष 2018 में लैंसडौन वन प्रभाग के यमकेश्वर ब्लॉक में हमलों की संख्या बढ़ने पर यह अध्ययन कराया गया।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:
भालुओं के हाइबरनेशन चक्र में स्पष्ट रूप से बाधा देखी गई।
कई भालू पूरे साल एक्टिव पाए गए, यानी वे शीत–निद्रा में गए ही नहीं।
इसके संभावित कारण:
कम बर्फबारी
फीडिंग बिहेवियर (भोजन पैटर्न) में बदलाव
मानव बस्तियों के पास भोजन के स्रोत बढ़ना
जलवायु परिवर्तन
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, हाइबरनेशन न होने पर भालू लगातार भोजन की तलाश में सक्रिय रहते हैं, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम, कम बर्फबारी और जंगलों में भोजन की कमी भालुओं को गांवों की ओर खींच रही है। इससे न केवल हमलों में वृद्धि हुई है, बल्कि भालुओं के प्राकृतिक व्यवहार पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है।
Reported By: Praveen Bhardwaj














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