देवभूमि उत्तराखंड केवल हिमालय की ऊँची चोटियों, पवित्र नदियों और आध्यात्मिक धरोहरों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि उन वीरांगनाओं, समाज सुधारकों, साहित्यकारों और आंदोलनकारियों की भी रही है जिन्होंने अपने साहस, त्याग और नेतृत्व से इतिहास रचा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऐसी ही कई महान महिलाओं को याद किया जाता है, जिनकी प्रेरणादायी गाथाएँ आज भी समाज को नई दिशा देती हैं।
गढ़वाल की वीरता का प्रतीक मानी जाने वाली Maharani Karnavati ने 17वीं शताब्दी में मुगल आक्रमण के समय अद्भुत साहस का परिचय दिया। शत्रु सैनिकों को परास्त कर उनकी नाक कटवाकर वापस भेजने की घटना के कारण उन्हें “नाक काटी रानी” के नाम से जाना गया। उनकी वीरता उत्तराखंड की अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतीक बनी।
इसी वीर परंपरा को आगे बढ़ाया Teelu Rauteli ने। किशोरावस्था में ही पिता और भाइयों की शहादत के बाद उन्होंने हथियार उठाए और कई युद्धों में विजय प्राप्त की। मात्र 15 वर्ष की आयु में रणभूमि में उतरने वाली तीलू रौतेली आज भी साहस की मिसाल मानी जाती हैं। उनके सम्मान में उत्तराखंड सरकार ‘तीलू रौतेली पुरस्कार’ प्रदान करती है।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में Thaguli Devi, जिन्हें टिंचरी माई के नाम से जाना जाता है, ने शराबबंदी आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया और महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में Gaura Devi का नाम विश्वभर में प्रसिद्ध है। 1970 के दशक में जब जंगलों की कटाई का खतरा बढ़ा, तब उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के साथ पेड़ों से चिपककर जंगलों की रक्षा की। उनका यह कदम Chipko Movement का प्रतीक बन गया और दुनिया भर में पर्यावरण आंदोलनों को प्रेरित किया।
महिला शिक्षा और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में Radha Behn का योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कौसानी के नारायण आश्रम से जुड़कर पहाड़ की महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई।
स्वतंत्रता संग्राम में भी उत्तराखंड की महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश मूल की Sarala Behn ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और महिलाओं में जागरूकता और स्वावलंबन की भावना जगाई। इसी क्रम में Bisni Devi Shah स्वतंत्रता संग्राम में जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला बनीं।
कुमाऊँ मूल की Begum Rana Liaquat Ali Khan, जिन्हें “आयरन पंत” भी कहा जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित रहीं। वे पाकिस्तान की पहली महिला गवर्नर और राजदूत बनीं तथा मानवाधिकारों के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें सम्मानित किया।
खेल जगत में Hansa Manral ने द्रोणाचार्य पुरस्कार प्राप्त कर इतिहास रचा। शिक्षा के क्षेत्र में Sushila Dobhal गढ़वाल विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति बनीं और शिक्षा जगत में नई ऊँचाइयाँ स्थापित कीं।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी महिलाओं की भूमिका अहम रही। Subhashini Bartwal ने आंदोलन के दौरान कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया, वहीं मसूरी गोलीकांड में Belmati Chauhan और Hansa Dhanai ने अपने प्राणों की आहुति देकर राज्य निर्माण के संघर्ष को नई दिशा दी।
साहित्य जगत में Gaura Pant Shivani ने अपने उपन्यासों और कहानियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनकी पुत्री Mrinal Pande ने पत्रकारिता और साहित्य दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।
राजनीति और समाज सेवा में Kamlendu Mati Shah का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। टिहरी की महारानी और सांसद के रूप में उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य किया और पद्म भूषण से सम्मानित हुईं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें इन महान महिलाओं के संघर्ष, साहस और नेतृत्व को याद करने का अवसर देता है। उत्तराखंड की इन प्रेरणादायी महिलाओं ने यह सिद्ध किया है कि शिक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना के बल पर महिलाएँ हर क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कर सकती हैं। देवभूमि की ये महान महिलाएँ आज भी समाज को साहस, संघर्ष और समर्पण की प्रेरणा देती हैं।
Reported By: Dr. Anil Chandola













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