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उत्तराखंड के पूर्व विधायक और मंत्री स्व. मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ की पुण्यतिथि पर आयोजित “हिमालयी संवाद” व्याख्यान में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सुरेंद्र सिंह पांगती ने पंचायत व्यवस्था और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर बेबाक व विचारोत्तेजक वक्तव्य दिया। दो बार गढ़वाल मंडल के कमिश्नर रह चुके पांगती ने कहा कि ‘गांववासी’ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि गांव के अधिकारों और पीड़ा की आवाज थे। उन्होंने बताया कि अपने प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान गांववासी जी से उनका गहरा संवाद रहता था और दोनों अक्सर उत्तराखंड के भविष्य और जनहित के मुद्दों पर चर्चा करते थे।
अपने संबोधन में पांगती ने कहा कि केरल में ग्राम पंचायतों को पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं और वहां सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, जबकि उत्तराखंड को भी ऐसे अधिकार बहुत पहले मिल जाने चाहिए थे। उन्होंने साफ कहा कि राज्य के विधायक नहीं चाहते कि पंचायतें वास्तविक रूप से सशक्त हों—“पंचायतों के असली अधिकार आज भी विधायकों के पास हैं, और वे सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होने देना चाहते।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि केवल घोषणा करने से पंचायतें मजबूत नहीं होतीं—“बिना अधिकार दिए कोई संस्था मजबूत नहीं हो सकती।”
स्व. मोहन सिंह रावत को याद करते हुए पांगती ने कहा कि उन्होंने अपने स्तर पर ग्रामीण विकास और पंचायती राज को सशक्त करने की पूरी कोशिश की, लेकिन एक व्यक्ति पूरी व्यवस्था नहीं बदल सकता। संघर्ष के बावजूद सत्ता संरचना ने उन्हें वह शक्ति नहीं दी, जिसकी ग्रामीण क्षेत्रों को आवश्यकता थी।
गौरतलब है कि गांववासी जी उत्तरांचल राज्य अंतरिम सरकार में ग्राम्य विकास और पंचायती राज मंत्री रहे थे।












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