भारत में शहरीकरण की गति लगातार तेज़ हो रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की शहरीकरण दर 31.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो वर्ष 2001 में 27.8 प्रतिशत थी। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक लगभग 590 मिलियन लोग शहरी क्षेत्रों में निवास करेंगे। तीव्र शहरीकरण के साथ जनसंख्या, विकास के रुझानों और उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक हो गया है।
शहरीकरण योजनाबद्ध बस्तियों और स्वतः विकसित अनियोजित बस्तियों—दोनों रूपों में सामने आता है। जहाँ एक ओर योजनाबद्ध विकास सतत विकास को बढ़ावा देता है, वहीं अनियोजित शहरी विस्तार अनौपचारिक और असुरक्षित जीवन परिस्थितियाँ पैदा करता है। व्यापार-उद्योग, आर्थिक अवसर, शिक्षा, बेहतर जीवनशैली और ग्रामीण-शहरी प्रवासन शहरीकरण के प्रमुख कारण हैं।
हालाँकि शहरी विकास से सकल घरेलू उत्पाद और रोज़गार में वृद्धि की संभावनाएँ हैं, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं। यातायात भीड़, परिवहन संकट, वायु प्रदूषण, पर्यावरण क्षरण, अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव, हरित क्षेत्रों की कमी, जल की कमी और अपर्याप्त जल प्रबंधन जैसी समस्याएँ गंभीर रूप ले रही हैं।
इसके अलावा, आवास की कमी, स्वच्छ जल और स्वच्छता तक सीमित पहुँच, अनियमित प्रवासन, कमजोर स्थानीय प्रशासन और बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानता शहरी क्षेत्रों की प्रमुख चुनौतियाँ हैं। जलवायु परिवर्तन भी भारतीय शहरों को गहराई से प्रभावित कर रहा है, जिससे प्रदूषण, शहरी बाढ़ और अत्यधिक तापमान जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इन बहुआयामी चुनौतियों का समाधान किए बिना समावेशी और टिकाऊ शहरी विकास संभव नहीं है।
मुक्ता नायक, आर्किटेक्ट एंड अर्बन प्लानर
अनूप नौटियाल, सोशल एक्टिविस्ट
Reported By: Praveen Bhardwaj












Discussion about this post