वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई), देहरादून में भारतीय सेना के अधिकारियों एवं जवानों के लिए “वन पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण एवं सतत प्रबंधन” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। संस्थान के बोर्ड रूम में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन एफआरआई की निदेशक ऋचा मिश्रा (आईएफएस) ने किया। प्रशिक्षण में लेफ्टिनेंट कर्नल मनोज गुरुंग, मेजर पी.सी. मिश्रा सहित लगभग 45 सैन्य कर्मियों ने भाग लिया।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए एफआरआई की निदेशक ऋचा मिश्रा ने राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना जहां देश की सुरक्षा सुनिश्चित करती है, वहीं वन जलवायु संतुलन बनाए रखने, जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य रक्षा तैयारियों और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलित दृष्टिकोण विकसित करना है।
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प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सेना के अधिकारियों और जवानों को विशेष रूप से उन क्षेत्रों में पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता के प्रति जागरूक करना था, जहां सैन्य गतिविधियां संवेदनशील वन क्षेत्रों और पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी होती हैं। कार्यक्रम में फायरिंग रेंज के आसपास वनस्पतियों एवं वन्यजीवों की पहचान, वन्यजीवों के प्रजनन काल में बरती जाने वाली सावधानियां, प्रदूषण नियंत्रण और क्षतिग्रस्त भू-दृश्यों के पुनर्स्थापन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से जानकारी दी गई।
एफआरआई के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक एन. बाला ने क्षतिग्रस्त वन भूमि के पुनर्स्थापन पर व्याख्यान दिया। वहीं भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), कोलकाता के वैज्ञानिक डॉ. ललित कुमार शर्मा ने सैन्य फायरिंग रेंज में पाए जाने वाले प्रमुख वन्यजीवों के व्यवहार, उनके प्रजनन से जुड़ी चुनौतियों और आवश्यक सुरक्षा उपायों पर विस्तृत जानकारी साझा की।
इसके अलावा अन्य विशेषज्ञों ने जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और प्रदूषण प्रबंधन जैसे विषयों पर व्याख्यान दिए। विशेषज्ञों ने विशेष रूप से सैन्य फायरिंग गतिविधियों के कारण मिट्टी, जल और वायु पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने के वैज्ञानिक उपायों पर भी प्रकाश डाला।
एफआरआई के इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को सेना और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है, जिससे भविष्य में सैन्य गतिविधियों के दौरान प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता के संरक्षण को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।












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