
हिमालयी क्षेत्रों में लगातार गहराते मौसमी जल संकट से निपटने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की ने महत्वपूर्ण पहल की है। संस्थान की टीम ने टिहरी जिले के कीर्तिनगर ब्लॉक स्थित ऊंचौन गांव में वैज्ञानिक तकनीक की मदद से एक नए जलस्रोत का विकास किया है। इस प्रयास से कम जल उपलब्धता वाले मौसम में गांव में पेयजल की उपलब्धता लगभग 500 लीटर प्रतिदिन से बढ़कर 1,000 लीटर या उससे अधिक हो गई है। इससे गर्मियों के दौरान पानी की किल्लत का सामना करने वाले स्थानीय परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है।
यह पहल टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों के पुनर्जीवन से जुड़ी परियोजना का हिस्सा है। परियोजना को नमामि गंगे और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से वित्तपोषित किया जा रहा है। आईआईटी रुड़की इस परियोजना का प्रमुख संस्थान है, जबकि पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य इसके प्रधान अन्वेषक हैं।
आईआईटी रुड़की की यह पहल तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में किए गए दो शोध अध्ययनों के निष्कर्षों पर आधारित है। अलकनंदा नदी बेसिन के अंतर्गत आने वाला यह क्षेत्र लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैला है। शोध में जलस्रोतों के पुनर्भरण की प्रक्रिया, भूजल के स्रोतों और पानी की रासायनिक संरचना को प्रभावित करने वाले भूवैज्ञानिक कारकों का अध्ययन किया गया।
पहला शोध अध्ययन 12 अक्टूबर 2026 को हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ। इसमें स्थिर एवं रेडियो समस्थानिकों, ट्रिटियम मापन और जल-मौसम विज्ञान संबंधी आंकड़ों के आधार पर जलस्रोतों के पुनर्भरण की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार, जलस्रोतों के पुनर्भरण में मानसूनी वर्षा की हिस्सेदारी करीब 82 प्रतिशत है, जबकि शीतकालीन और मानसून-पूर्व वर्षा का योगदान क्रमशः 10 और 8 प्रतिशत है। इससे जलस्रोतों को बनाए रखने में मानसूनी पानी के जमीन के भीतर पहुंचने और भूजल भंडारण की अहमियत सामने आई।
दूसरा अध्ययन वर्ष 2026 में एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसमें बताया गया कि भूवैज्ञानिक संरचनाएं और मौसमी अपक्षय प्रक्रियाएं जलस्रोतों के पानी की रासायनिक संरचना को प्रभावित करती हैं। शोध में कार्बोनेट शैलों का अपक्षय, मौसमी पुनर्भरण और मानवीय गतिविधियों को जल की रासायनिक विशेषताओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में चिह्नित किया गया।
इन दोनों अध्ययनों से प्राप्त जानकारी के आधार पर आईआईटी रुड़की की टीम ने ऊंचौन गांव में जलस्रोत विकसित करने की योजना तैयार की। इसके लिए भूभौतिकीय जांच के माध्यम से जमीन के भीतर जलधारण करने वाली शैल परतों की पहचान की गई। इसके बाद जलधारण करने वाले क्षेत्रों की गहराई और विस्तार का आकलन कर ऊपरी ढलान पर कई खाइयां बनाने की योजना बनाई गई। इन खाइयों के माध्यम से सतही पानी की गति धीमी कर उसे जमीन के भीतर रिसने और भूजल पुनर्भरण में योगदान देने का अवसर मिला।
चिह्नित जलधारण क्षेत्र में एक नियंत्रित मार्ग तैयार किया गया, जिससे भूजल सतह पर आ सके। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नया जलस्रोत विकसित हुआ। यह जलस्रोत कीर्तिनगर ब्लॉक के ऊंचौन गांव, डाकघर तकोली में चंद्रबदनी मंदिर की ओर जाने वाली नवनिर्मित सड़क के किनारे बनाया गया है। इसके बाद कम पानी वाले मौसम में भी गांव में प्रतिदिन पानी की उपलब्धता बढ़कर 1,000 लीटर या उससे अधिक हो गई है।
आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट का समाधान करने के लिए जलस्रोतों के स्रोत, प्रवाह और मौसमी व्यवहार को समझना जरूरी है। शोध मानसूनी पुनर्भरण, भूजल भंडारण और भूवैज्ञानिक परिस्थितियों के महत्व को रेखांकित करता है। इस तरह की वैज्ञानिक जानकारी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जलस्रोतों के टिकाऊ प्रबंधन में मदद कर सकती है।
वहीं, आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का वास्तविक सामाजिक योगदान तब सामने आता है, जब वह समुदायों की समस्याओं के समाधान में सहायक बनता है। संस्थान का प्रयास वैज्ञानिक साक्ष्यों को धरातल पर लागू कर हिमालयी क्षेत्रों में जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी जलस्रोत पर्वतीय समुदायों के लिए पेयजल के प्रमुख स्रोत हैं, लेकिन इनमें से लगभग 50 प्रतिशत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या उनका प्रवाह गंभीर रूप से कम हो गया है। ऐसे में जलस्रोतों के पुनर्भरण को प्रभावित करने वाले भूवैज्ञानिक और जलवैज्ञानिक कारकों को समझना बेहद जरूरी है। ऊंचौन गांव में किया गया यह प्रयोग वैज्ञानिक अनुसंधान और स्थानीय स्तर पर किए गए हस्तक्षेप के जरिए ग्रामीण जल सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। हालांकि, इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए जलस्रोत के प्रवाह और गुणवत्ता की नियमित निगरानी के साथ स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी जरूरी होगी।
Reported By: Arun sharma













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