
महानवमी के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ कन्या पूजन एवं कन्या भोज का आयोजन किया गया। परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कन्याओं को भोजन कराया और मातृशक्ति के सम्मान का संदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि कन्या पूजन तभी सार्थक होगा, जब समाज बेटियों को पूजा के साथ समान अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान भी प्रदान करेगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि कन्या पूजन भारतीय संस्कृति की सुंदर आध्यात्मिक परंपरा है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि नारी सृजन, संवेदना, शक्ति, ज्ञान और करुणा की जीवंत अभिव्यक्ति है। हालांकि, नारी शक्ति की आराधना की वास्तविक पूर्णता तभी है, जब समाज प्रत्येक दिन बेटियों की गरिमा, अधिकारों और संभावनाओं का सम्मान करे।
उन्होंने कहा, “कन्याओं को केवल जिमाएं नहीं, उन्हें जमाएं भी; उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी करें।” बेटियों को शिक्षा, सम्मान, पहचान और सुरक्षा देने के साथ उन्हें बराबरी का स्थान मिलना चाहिए। उनके सपनों को पंख देने, प्रतिभा को अवसर प्रदान करने और आत्मविश्वास को मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकें।
स्वामी जी ने कहा कि यदि हम कन्या में मां दुर्गा का स्वरूप देखते हैं, तो उसकी शिक्षा, आत्मविश्वास और स्वावलंबन को भी उतना ही महत्व देना होगा। कन्या पूजन के साथ समाज को भेदभाव, भय, असुरक्षा और अवसरों की असमानता दूर करने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना हमें शक्ति, ज्ञान, धैर्य, करुणा, साहस और पवित्रता जैसे गुणों की प्रेरणा देती है। इन गुणों का वास्तविक सम्मान तभी है, जब उन्हें अपने व्यवहार और सामाजिक व्यवस्था में अपनाया जाए। देवी की आराधना केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि घरों, विद्यालयों, कार्यस्थलों और समाज में भी संवेदनशीलता, न्याय और मानवीय मूल्यों के रूप में दिखाई देनी चाहिए।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए केवल अवसर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके रास्ते में आने वाली बाधाओं को भी दूर करना होगा। परिवारों को बेटियों के विचार सुनने, उनकी शिक्षा को प्राथमिकता देने, उनकी क्षमताओं पर विश्वास करने और उन्हें निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। उनकी गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना परिवार तथा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि किसी बेटी की पहचान केवल पुत्री, बहन, पत्नी या माता तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसकी अपनी प्रतिभा, सपने, चेतना और स्वतंत्र पहचान भी है। बेटियों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ सकें और समाज के निर्माण में पूरी भागीदारी निभा सकें।
महानवमी के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि साधना का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठानों को पूरा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर सद्बुद्धि, विवेक, करुणा और आत्मसंयम को जागृत करना भी है। मां सिद्धिदात्री की आराधना आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान और जीवन की पूर्णता की प्रेरणा देती है। अपनी उपलब्धियों को अहंकार के बजाय सेवा का माध्यम बनाना और ज्ञान को समाज के कल्याण में लगाना ही आध्यात्मिक मूल्यों की सार्थकता है।
स्वामी जी ने समाज से आह्वान किया कि कन्या पूजन के अवसर पर यह भी आत्ममंथन किया जाए कि क्या बेटियों को वास्तव में सुरक्षित, समान और भयमुक्त वातावरण मिल रहा है। उन्होंने कहा कि कन्या पूजन की सार्थकता इसी में है कि हर बेटी को पूजा के साथ समान अधिकार, आत्मनिर्भरता और सम्मानपूर्ण जीवन मिले। समाज को ऐसा वातावरण तैयार करने का संकल्प लेना चाहिए, जहां नारी शक्ति केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि समान अधिकारों और स्वाभिमान के साथ प्रतिष्ठित हो।
Reported By: Arun Sharma













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