भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं ने प्रदूषित जल से यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earth Elements) को प्रभावी ढंग से हटाने और उनकी पुनर्प्राप्ति करने वाली एक अत्याधुनिक अम्ल-प्रतिरोधी नैनोकम्पोज़िट तकनीक विकसित की है। यह तकनीक न केवल रेडियोधर्मी और विषैले तत्वों से जल को शुद्ध करने में सक्षम है, बल्कि इन मूल्यवान संसाधनों को दोबारा उपयोग के लिए भी उपलब्ध कराती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, दुर्लभ मृदा तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्टफोन, पवन टर्बाइन, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और कई आधुनिक तकनीकों के निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण हैं, जबकि यूरेनियम परमाणु ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख ईंधन है। खनन क्षेत्रों के प्रदूषित जल में ये तत्व अक्सर एक साथ पाए जाते हैं, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
अम्लीय वातावरण में भी रहेगा प्रभावी
आईआईटी रुड़की की टीम ने इस चुनौती का समाधान करते हुए सक्रिय नैनोकणों के चारों ओर सिलिका का सुरक्षात्मक आवरण विकसित किया है। यह परत अत्यधिक अम्लीय परिस्थितियों में भी नैनोकम्पोज़िट को क्षतिग्रस्त होने से बचाती है और उसकी प्रदूषकों को अवशोषित करने की क्षमता बनाए रखती है।
शोधकर्ताओं ने इस सिलिका परत को पारंपरिक विषैले रसायनों के बजाय जैव-अनुकूल अभिकर्मकों की मदद से तैयार किया है, जिससे यह तकनीक अधिक सुरक्षित और पर्यावरण हितैषी बन गई है।
एक किलो सामग्री से 370 ग्राम तक तत्वों की रिकवरी
प्रयोगशाला परीक्षणों में यह नैनोकम्पोज़िट प्रति किलोग्राम सामग्री से 370 ग्राम तक यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों को हटाने और पुनर्प्राप्त करने में सफल रहा। यह प्राकृतिक भूजल जैसी परिस्थितियों में भी प्रभावी ढंग से कार्य करता है और अत्यधिक अम्लीय जल में भी अपनी क्षमता बनाए रखता है।
शोध में यह भी पाया गया कि सामान्य परिस्थितियों में यह सामग्री यूरेनियम और दुर्लभ मृदा तत्वों दोनों को अवशोषित करती है, जबकि अत्यधिक अम्लीय वातावरण में यह विशेष रूप से यूरेनियम को चुनकर हटाने में सक्षम है। लगातार पांच परीक्षण चक्रों के बाद भी इसकी कार्यक्षमता लगभग पूरी तरह बरकरार रही।
पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों की पुनर्प्राप्ति की दिशा में अहम कदम
परियोजना के प्रमुख शोधकर्ता प्रो. नितिन खंडेलवाल ने बताया कि अधिकांश उन्नत धात्विक नैनोमैटेरियल अत्यधिक अम्लीय वातावरण में अपनी कार्यक्षमता खो देते हैं, लेकिन नई तकनीक में विकसित अम्ल-प्रतिरोधी सिलिका आवरण इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।
वहीं, परियोजना से जुड़ी पीएचडी शोधार्थी भाव्या स्वामी ने बताया कि इस सामग्री में अपशिष्ट सीवेज स्लज से तैयार बायोचार का भी उपयोग किया गया है। इससे अपशिष्ट पदार्थों का मूल्य संवर्धन संभव हुआ है और यह तकनीक सतत विकास तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
अगला चरण होगा वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण
फिलहाल इस तकनीक का सफल परीक्षण प्रयोगशाला स्तर पर किया गया है। अब शोधकर्ता इसे वास्तविक खनन अपशिष्ट जल और परमाणु अपशिष्ट जल में सतत प्रवाह की परिस्थितियों में परखने की तैयारी कर रहे हैं।
इस परियोजना को भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के बोर्ड ऑफ रिसर्च इन न्यूक्लियर साइंसेज़ (BRNS) का वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह नवाचार भविष्य में जल शोधन, रणनीतिक धातुओं की पुनर्प्राप्ति और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
Reported By: Arun Sharma











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