बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। चिकित्सकों के अनुसार हवा में मौजूद धूल, धुआं और हानिकारक सूक्ष्म कण अस्थमा के मरीजों की स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञ मरीजों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं, खासकर प्रदूषित इलाकों में काम करने से बचने और मास्क के नियमित उपयोग पर जोर दिया जा रहा है।
विश्व अस्थमा दिवस हर वर्ष मई महीने के पहले मंगलवार को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अस्थमा रोग के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इस वर्ष की थीम “अस्थमा से पीड़ित सभी लोगों के लिए सूजनरोधी इनहेलर की उपलब्धता – अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता” रखी गई है, जो खासकर बच्चों और गंभीर मरीजों के लिए इनहेलर उपचार की अहमियत को रेखांकित करती है।
अस्थमा एक दीर्घकालिक श्वसन रोग है, जिसमें वायुमार्ग में सूजन और संकुचन के कारण सांस लेने में कठिनाई होती है। इसके प्रमुख लक्षणों में रात के समय खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न और घरघराहट शामिल हैं। हालांकि इसका पूर्ण इलाज संभव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि एलोपैथिक इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉयड थेरेपी अस्थमा के उपचार में सबसे प्रभावी मानी जाती है। इनहेलर दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचाकर सूजन को नियंत्रित करता है, जिससे मरीजों को तुरंत राहत मिलती है। उन्होंने मरीजों को धूल और धुएं से बचने तथा प्रदूषण वाले क्षेत्रों में मास्क पहनने की सलाह दी।
इसके साथ ही आयुष पद्धति को भी सहायक उपचार के रूप में उपयोगी बताया गया है। आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा में किए गए कई शोध यह दर्शाते हैं कि एलोपैथिक उपचार के साथ इनका संयोजन अस्थमा की गंभीरता को कम करने में मदद करता है। आयुर्वेदिक औषधियों जैसे तुलसी, वासा, पिप्पली, हरिद्रा और मेथी को बलगम नियंत्रण में सहायक माना गया है। वहीं पंचकर्म चिकित्सा जैसे वमन और बस्ती भी लाभकारी बताए गए हैं।
योग और प्राणायाम भी अस्थमा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सूर्यनमस्कार, गोमुखासन और धनुरासन जैसे योगासन तथा अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन और भ्रामरी प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने और सांस संबंधी लक्षणों को कम करने में सहायक माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अस्थमा के बढ़ते मामलों को देखते हुए जागरूकता, समय पर उपचार और प्रदूषण नियंत्रण बेहद जरूरी है, ताकि मरीजों को बेहतर जीवन गुणवत्ता मिल सके।
एम्स में पिडियाट्रिक पल्मोनरी विभाग की हेड और संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने कहा कि बढ़ते प्रदूषण की वजह से छोटे बच्चे भी सांस की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने इसे चिंताजनक बताते हुए इसके लिए एजर्जी, संक्रमण और प्रदूषण को मुख्य कारण बताया। कहा कि कुछ हद तक इसके लिए जीन्स और मोटापा भी जिम्मेदार है। बताया कि प्रदूषण के कारण सांस की नली में सूजन आने से बच्चों में यह समस्या बढ़ रही है।
Reported By: Arun sharma












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