एम्स ऋषिकेश के ट्रॉमा विशेषज्ञों ने नुकीली वस्तु से दिल में लगी गंभीर चोट (पेनिट्रेटिंग कार्डियक इंजरी) के एक बेहद चुनौतीपूर्ण मामले में धड़कते दिल के साथ सफल सर्जरी कर मरीज की जान बचाई। चिकित्सीय भाषा में इसे ऑफ-पंप कार्डियक सर्जरी कहा जाता है, जो बेहद जोखिमपूर्ण मानी जाती है। संस्थान के अनुसार, उत्तराखंड में ट्रॉमा के ऐसे मामले में यह पहली सफल ऑफ-पंप कार्डियक सर्जरी है।
यह जटिल सर्जरी 27 अगस्त 2026 को एम्स ऋषिकेश के ट्रॉमा सर्जरी विभाग की टीम ने की थी। ट्रॉमा सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. एम. क्यू. आजम ने बताया कि पेनिट्रेटिंग कार्डियक इंजरी के मामलों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। मरीज की जान बचाने के लिए तत्काल निर्णय और विभिन्न विशेषज्ञ टीमों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होता है।
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उन्होंने बताया कि इस मामले में ट्रॉमा सर्जरी, एनेस्थीसिया, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन और नर्सिंग टीम के बीच बेहतरीन तालमेल के कारण मरीज को बचाने में सफलता मिली।
आधी रात गंभीर हालत में पहुंचा था मरीज
ट्रॉमा सर्जन डॉ. नीरज सिंह के अनुसार, श्यामपुर निवासी 21 वर्षीय अखिल सती को उनके पिता 27 अगस्त की मध्यरात्रि गंभीर अवस्था में ट्रॉमा इमरजेंसी लेकर पहुंचे थे। युवक के दिल में किसी नुकीली वस्तु से गहरी चोट लगी थी और उसका रक्तचाप बेहद कम हो चुका था।
दिल के फट जाने के कारण स्थिति बेहद गंभीर थी और मरीज की जान बचाने के लिए एक-एक मिनट बेहद महत्वपूर्ण था। चिकित्सकों ने तत्काल आपातकालीन सर्जरी का निर्णय लिया और मरीज को लाइफ सेविंग ऑपरेशन के लिए ले जाया गया।
डॉ. नीरज ने बताया कि मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए सर्जरी हार्ट-लंग मशीन के बिना, धड़कते दिल के साथ करनी पड़ी। बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में टीम ने सफलतापूर्वक ऑपरेशन पूरा किया। सर्जरी के बाद मरीज को छह दिनों तक गहन चिकित्सा एवं विशेष निगरानी में रखा गया और स्वस्थ होने के बाद 3 सितंबर को डिस्चार्ज कर दिया गया।
डॉक्टरों की टीम ने निभाई अहम भूमिका
सर्जरी करने वाली टीम में ट्रॉमा सर्जन डॉ. नीरज कुमार, डॉ. एकता, डॉ. रुशल और डॉ. गर्वित शामिल रहे। वहीं एनेस्थीसिया टीम में डॉ. प्रवीण तलवार, डॉ. संदीप और डॉ. मिन्हाज का विशेष सहयोग रहा।
संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रो. मीनू सिंह ने पूरी टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
ट्रॉमा सर्जरी विभाग के फैकल्टी डॉ. मधुर उनियाल ने बताया कि इस प्रकार की गंभीर चोटों में मरीज के जीवित बचने की संभावना काफी कम होती है। उन्होंने कहा कि पिछले सात वर्षों में ट्रॉमा सर्जरी विभाग को लगातार मजबूत किया गया है और अब विभाग ऐसे दुर्लभ एवं चुनौतीपूर्ण मामलों को संभालने में पूरी तरह सक्षम है।
एम्स ऋषिकेश की यह उपलब्धि उत्तराखंड में गंभीर हृदय आघात के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण चिकित्सीय उपलब्धि मानी जा रही है।
Reported By: Arun Sharma












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