देवभूमि Rishikesh स्थित Parmarth Niketan में प्रातःकालीन बेला के दौरान एक विशेष आध्यात्मिक संवाद का आयोजन हुआ। इस अवसर पर Swami Chidanand Saraswati और सुप्रसिद्ध गायक Kailash Kher के बीच भारतीय गुरुकुल परंपरा, भजन, आध्यात्मिक संगीत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
चर्चा के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि गुरुकुलों में भजन, कीर्तन और आध्यात्मिक संगीत के माध्यम से युवाओं को भारतीय संस्कृति, संस्कारों और अध्यात्म से जोड़ा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नई पीढ़ी को संत वाणी, वेद मंत्र और शास्त्रीय संगीत से परिचित कराया जाए, तो उनमें आत्मविश्वास, अनुशासन, करुणा और राष्ट्रप्रेम जैसे गुण विकसित होंगे।
Swami Chidanand Saraswati ने कहा कि भारत की गुरुकुल परंपरा केवल शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन निर्माण की प्रक्रिया है। इसमें ज्ञान के साथ आचरण, सेवा, साधना और संगीत का समन्वय होता है। उन्होंने कहा कि भजन और संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं, जिन्हें केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर मानवता के उत्थान और समाज के जागरण का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
वहीं Kailash Kher ने कहा कि भारत की भूमि में संगीत ही साधना है और स्वर ही उपासना। उन्होंने भजन परंपरा को ऋषियों की दृष्टि, संतों की करुणा और ईश्वर के स्पर्श से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि जब घरों में भजन, घाटों पर आरती और मंदिरों में शंखनाद गूंजता है, तो वह न केवल व्यक्ति को शांति देता है, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को भी जीवंत बनाए रखता है।
चर्चा में यह भी विचार रखा गया कि आधुनिक समय में युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए भजन, लोकधुनों और आधुनिक माध्यमों का समन्वय आवश्यक है। यदि संस्कृति को स्वर मिले, तो वह जन-जन तक आसानी से पहुंच सकती है।
कार्यक्रम के अंत में स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सनातन धरोहर है और संगीत इस धरोहर को जीवंत रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाए, जहां हर घर में भजन, हर घाट पर आरती और हर हृदय में ईश्वर स्मरण हो, जिससे जीवन में संतुलन, शांति और आनंद बना रहे।
Reported By: Arun Sharma













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