जुलाई 2004 के शुरुआती वे दिन थे। नई दिल्ली से एक अधिकारिक घोषणा ने समूचे उत्तराखंड, विशेषकर टिहरी गढ़वाल की धमनियों में गर्व का संचार कर दिया था—लेफ्टिनेंट जनरल एम. एम. लखेड़ा को पांडिचेरी (पुदुच्चेरी) का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया था। उस दौर में ‘सहारा समय’ टीवी चैनल का प्रभाव वैसा ही था, जैसा आज के समय में सोशल मीडिया या फेसबुक का है। सूचनाओं का सबसे विश्वसनीय और त्वरित माध्यम। नई टिहरी जिला मुख्यालय में इस विधा की कमान संभालना किसी तपस्या से कम नहीं था। भौगोलिक चुनौतियाँ इतनी दुरुह थीं कि थौलधार-नगुण से लेकर कीर्तिनगर की सीमा तक, और इधर घनसाली के घुत्ततू से लेकर नरेंद्रनगर के मुनिकीरेती तक का एक विशाल, विषम भूभाग अकेले कवर करना पड़ता था।
◆ एक आदेश, एक उदासी और ‘जखण्ड’ की यात्रा
नोएडा से सहारा टीवी के उत्तराखंड हेड, कवि, पत्रकार और साहित्यकार प्रमोद कौंसवाल जी का फोन घनघनाया। उनकी आवाज़ में पत्रकारिता की वह चिरपरिचित तड़प और आत्मीयता थी: “लखेड़ा जी उपराज्यपाल बन गए हैं। जिस दिन वह शपथ लेंगे, हमें एक विस्तृत और भव्य स्टोरी चलानी है। आप तत्काल उनके पैतृक गांव ‘जखण्ड’ जाइए और वहां से ग्राउंड रिपोर्ट लेकर आइए।”
नई टिहरी से गडोलिया, पौखाल और फिर वहां से आगे जखण्ड की दूरी… मन भूगोल की कठिनता देखकर एक पल को उदास हुआ, कदम ठिठके, मना करने का विचार भी आया। पर पत्रकार का धर्म आराम पर भारी पड़ा। गडोलिया- मलेथा की उस शांत, वीरान सड़क से होते हुए जब जखण्ड पहुंचे, तो पता चला कि गांव मुख्य सड़क से एक किलोमीटर की सीधी चढ़ाई पर है। कैमरे के भारी-भरकम साजो-समान के साथ जब पसीना बहाते हुए गांव पहुंचे, तो थकान गर्व में बदल गई। वहां जनरल लखेड़ा के पैतृक घर की वीडियोग्राफी की। उनके चचेरे भाई और अन्य परिजनों से जब बात की, तो उनकी आँखों से बहते हर्ष के आँसू और कांपती आवाज़ ने उस इंटरव्यू को बेहद भावुक बना दिया। एक सुदूर पहाड़ के घर का बेटा देश के एक राज्य का संवैधानिक मुखिया बनने जा रहा था। विभिन्न कोणों से पूरी स्टोरी कवर कर जब देर रात नई टिहरी लौटे, तब असली चुनौती शुरू हुई। आज की तरह इंटरनेट का युग नहीं था। चंबा से चलने वाली ‘कमांडर जीप’ के ड्राइवर को वह वीडियो टेप सौंपी गई, जो ऋषिपर्णा (रिस्पना) पुल, देहरादून स्थित ब्यूरो ऑफिस तक पहुंचाई गई। तब जाकर वह ऐतिहासिक खबर स्क्रीन पर तैर सकी: “गढ़वाल मंडल के पहले और उत्तराखंड के दूसरे व्यक्ति, जो उपराज्यपाल बनने जा रहे हैं।” (बाद में वह मिजोरम के भी पूरे 5 साल तक राज्यपाल रहे)।
◆ पुरानी टिहरी का वह ‘दोबाटा’ फील्ड और जन-जन के नायक
इस नियुक्ति के पीछे केवल जनरल लखेड़ा का सैन्य कौशल नहीं था, बल्कि टिहरी के मानस पटल पर उनके प्रति एक गहरा कृतज्ञता का भाव भी था। बात साल 1989 या 1991 की रही होगी, जब जनरल लखेड़ा सेना में ‘एडुजेंट जनरल’ के पद पर तैनात थे। उस दौर में पहाड़ के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए लैंसडाउन की लंबी और खर्चीली यात्रा करनी पड़ती थी।
जनरल लखेड़ा ने पहाड़ की इस पीड़ा को समझा और सेना की भर्ती को सीधे पुरानी टिहरी के ‘दोबाटा’ मैदान में खींच लाए। वह ऐतिहासिक दिन था—एक ही भर्ती मेले से टिहरी और आसपास के 500 से अधिक युवाओं को भारतीय सेना की वर्दी पहनने का गौरव प्राप्त हुआ। उन्होंने एक झटके में सैकड़ों परिवारों के भविष्य को संवार दिया था।
◆ नागरिक अभिनंदन: आंसुओं और मालाओं का महासागर
यही कारण था कि जब उपराज्यपाल बनने के बाद जनरल लखेड़ा पहली बार अपने गृह जनपद नई टिहरी पहुंचे, तो जन-सैलाब उमड़ पड़ा। जिला मुख्यालय में आयोजित ‘नागरिक अभिनंदन’ केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोक-कृतज्ञता का उत्सव था। लोगों की आँखों में गर्व के आंसू थे और हाथों में गेंदे के फूलों की अनगिनत मालाएं। लगभग सभी जनप्रतिनिधि पक्ष- विपक्ष प्रेस क्लब नई टिहरी के हॉल में मौजूद थे। जनता ने अपने उस नायक को मालाओं से इस कदर लाद दिया, उनका गला और पूरा वजूद फूलों से भर गया। वह दृश्य आज भी टिहरी के इतिहास में दर्ज है कि कैसे एक फौजी अफसर ने जब अपनी माटी को कुछ दिया, तो माटी ने उन्हें अपने सिर आंखों पर बिठा लिया।
◆ शौर्य, रणनीति और राष्ट्रसेवा
भारतीय सैन्य इतिहास के फलक पर लेफ्टिनेंट जनरल मदन मोहन लखेड़ा का नाम एक ऐसे ‘पथप्रदर्शक सेनानायक’ के रूप में अंकित है, जिनका जीवन अदम्य साहस, रणनीतिक सूझबूझ और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा की जीवंत मिसाल है। राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज , राष्ट्रीय रक्षा अकादमी तथा भारतीय सैन्य अकादमी जैसी शीर्ष संस्थाओं के गौरवशाली पूर्व छात्र रहे जनरल लखेड़ा ने वर्ष 1958 में सेना में कमीशन प्राप्त कर देश की संप्रभुता की रक्षा का जो संकल्प लिया, उसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक निभाया।
◆ सैन्य जीवन के स्वर्णिम अध्याय और ऐतिहासिक ऑपरेशन
लगभग चार दशकों के अपने दीर्घकालिक और संवेदनशील सैन्य सफर में जनरल लखेड़ा आधुनिक भारत के कई सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक ऐतिहासिक मोर्चों पर अग्रिम पंक्ति में तैनात रहे:
1. गोवा मुक्ति अभियान (1961 – ऑपरेशन विजय): अपने सैन्य जीवन के शुरुआती दौर में ही उन्होंने वर्ष 1961 में पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ में सक्रिय रूप से सहभागिता की। 450 वर्षों के विदेशी दमन को समाप्त कर गोवा, दमन और दीव को भारतीय संघ में समाहित करने के इस ऐतिहासिक संप्रभुता अभियान में उनका योगदान उनके शुरुआती सैन्य नेतृत्व की पहचान बना।
2. भारत-पाक युद्ध (1965 और 1971): वह वर्ष 1965 और 1971 के दोनों बड़े
भारत-पाकिस्तान युद्धों के जीवंत गवाह और सक्रिय योद्धा रहे। अपनी यूनिट के छठे कमांडिंग ऑफिसर (26 जनवरी 1971 से 10 मई 1972) के रूप में, ‘ऑपरेशन कैक्टस लिली’ के दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर के दुर्गम ‘यांकी-वन’ (Yanki-1) सेक्टर में अदम्य साहस का परिचय दिया। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में यूनिट ने दुश्मन की 86 तोपों और 219 मोर्टार ठिकानों का सफलतापूर्वक ध्वस्त कर शत्रु की कमर तोड़ दी।
3. ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984):जब वह भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद पर कार्यरत थे, तब देश आंतरिक सुरक्षा के एक बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था। जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर को उग्रवादियों से मुक्त कराने के लिए चलाए गए अत्यंत जटिल और संवेदनशील ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के दौरान उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर एक सैन्य संरचना का कुशल और साहसिक नेतृत्व किया। इस विषम ऑपरेशन में उनकी रणनीतिक परिपक्वता ने सैन्य हलकों में उनकी विशिष्ट पहचान को और सुदृढ़ किया।
राष्ट्र सेवा का प्रशासनिक विस्तार: सैन्य वर्दी से राजभवन तक
राष्ट्र के प्रति उनकी इस अद्वितीय कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च परिचालन नेतृत्व के लिए उन्हें भारतीय सेना के तीन सबसे प्रतिष्ठित अलंकरणों—विशिष्ट सेवा पदक (VSM), अति विशिष्ट सेवा पदक (AVSM) तथा परम विशिष्ट सेवा पदक (PVSM) से विभूषित किया गया। “थंडरिंग टू नॉट फाइव – ईगल आई” का उद्घोष उनकी यूनिट की उसी अचूक मारक क्षमता और सतत सतर्कता का प्रतीक बना रहा।
सैन्य वर्दी उतारने के बाद भी उनकी राष्ट्रसेवा का प्रवाह थमा नहीं, बल्कि उसका स्वरूप प्रशासनिक हो गया। वर्ष 2004 से 2006 तक उन्होंने पुडुचेरी (पांडिचेरी) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) के रूप में और तत्पश्चात 2006 से 2011 तक मिजोरम के राज्यपाल के रूप में संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन किया। पूर्वोत्तर भारत और केंद्रशासित प्रदेशों में उनके कार्यकाल को आज भी प्रशासनिक सत्यनिष्ठा, संवेदनशीलता और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण के एक आदर्श युग के रूप में याद किया जाता है।
अकादमिक और सैन्य इतिहास के दृष्टिकोण से, जनरल मदन मोहन लखेड़ा का संपूर्ण जीवन इस बात का उत्कृष्ट दृष्टांत है कि कैसे एक सुदूर पर्वतीय अंचल (टिहरी गढ़वाल के जखण्ड गांव) से निकला युवा अपनी योग्यता, कड़े अनुशासन और देशप्रेम के बल पर भारतीय थलसेना के शीर्षतम पदों से होते हुए देश के राजभवनों तक का सफर तय कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शाश्वत प्रेरणापुंज बन जाता है।
भाई थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
लेफ्टिनेंट जनरल मदन मोहन लखेड़ा के बड़े भाई स्वर्गीय भूदेव लखेड़ा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे टिहरी जिला परिषद के अध्यक्ष भी रहे और 1990 के दशक में क्षेत्र के अत्यंत बुद्धिमान, दूरदर्शी तथा कुशल राजनीतिज्ञों में उनकी गणना होती थी। मेरा सौभाग्य रहा कि पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में मुझे उनके सान्निध्य में रहने और उनकी कार्यशैली को निकट से देखने का अवसर मिला।
◆ कोटि-कोटि नमन और श्रद्धांजलि
भारतीय सेना के गौरव, शौर्य और अनुशासन के प्रतीक, लेफ्टिनेंट जनरल एम. एम. लखेड़ा जी का 89 वर्ष की आयु में देहरादून में महाप्रयाण हम सभी के लिए एक अपूरणीय क्षति है। देवभूमि उत्तराखंड के इतिहास में उनका नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। देश की सीमाओं की रक्षा से लेकर विभिन्न उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने जो अद्वितीय सेवाएं दीं, उसके लिए राष्ट्र और विशेषकर उत्तराखंड का जन-जन उनका सदैव ऋणी रहेगा।
ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और उनके शोकाकुल परिवार—उनकी सुपुत्रियों अल्का कुकरेती जी, अनुपमा लखेड़ा जी, अर्चना पब्बाराजू जी एवं अन्विता लखेड़ा जी—को इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
Shishpal Gusain












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