क्या हमारी पहचान केवल हमारी उपलब्धियों से तय होती है? क्या सफलता ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है या जीवन का कोई गहरा उद्देश्य भी है? इन्हीं सवालों को केंद्र में रखकर लेखक एवं अधिवक्ता कार्तिकेय वाजपेयी की चर्चित पुस्तक ‘द अनबिकमिंग: लेट लाइफ़ रिवील इट्स पर्पज़’ पर देहरादून में एक विशेष साहित्यिक संवाद का आयोजन किया गया। ‘वैली ऑफ वर्ड्स’ अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, लेखकों, पाठकों और बुद्धिजीवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पुस्तक के औपचारिक लोकार्पण के साथ हुआ। इस अवसर पर लेखक कार्तिकेय वाजपेयी, ‘वैली ऑफ वर्ड्स’ के फेस्टिवल डायरेक्टर डॉ. संजीव चोपड़ा, सतीश शर्मा और रश्मि चोपड़ा मौजूद रहे। इसके बाद डॉ. संजीव चोपड़ा और कार्तिकेय वाजपेयी के बीच आधुनिक जीवन, आत्मबोध और जीवन के उद्देश्य पर केंद्रित एक विचारोत्तेजक संवाद हुआ, जिसमें पहचान, महत्वाकांक्षा, भय और आत्मस्वीकृति जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
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संवाद के दौरान कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा कि आज की दुनिया लोगों को लगातार अधिक हासिल करने और दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन इस दौड़ में व्यक्ति अक्सर यह भूल जाता है कि वह वास्तव में कौन है। उन्होंने कहा कि ‘द अनबिकमिंग’ किसी निश्चित उत्तर तक पहुंचने की नहीं, बल्कि स्वयं से ईमानदार प्रश्न पूछने की यात्रा है। यदि यह पुस्तक पाठकों को कुछ देर रुककर अपने भीतर झांकने और जीवन के उद्देश्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है, तो वही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
डॉ. संजीव चोपड़ा ने कहा कि साहित्य का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल कहानी सुनाना नहीं, बल्कि पाठकों के भीतर नए विचारों के द्वार खोलना है। उनके अनुसार, ‘द अनबिकमिंग’ ऐसी पुस्तक है जो आसान उत्तर देने के बजाय कठिन प्रश्न पूछने का साहस करती है और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर भी विचार साझा किए कि सामाजिक अपेक्षाएं, उपलब्धियों का दबाव और सफलता की पारंपरिक परिभाषाएं किस प्रकार व्यक्ति की पहचान को प्रभावित करती हैं। चर्चा में यह भी सामने आया कि आत्मबोध की वास्तविक यात्रा तब शुरू होती है, जब व्यक्ति उन पहचानों पर प्रश्न उठाना शुरू करता है जिन्हें उसने बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया होता है।
पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें विश्व के दो प्रतिष्ठित आध्यात्मिक चिंतकों—परम पावन दलाई लामा और स्वामी सर्वप्रियानंद—की भूमिका (फोरवर्ड) शामिल है। आध्यात्मिकता, आत्मचिंतन और चेतना पर उनके विचार पुस्तक को व्यापक दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र सिद्धार्थ, जो एक चर्चित क्रिकेटर है, और उसके गुरु अजय की कहानी के माध्यम से आधुनिक जीवन के उन सवालों को सामने लाया गया है, जिनसे आज का व्यक्ति किसी न किसी रूप में जूझ रहा है। गुरु-शिष्य संबंध, पहचान, भय, महत्वाकांक्षा, रिश्ते, अपेक्षाएं और आत्मस्वीकृति जैसे विषय पुस्तक की मूल संवेदना का हिस्सा हैं।
कार्यक्रम के समापन पर श्रोताओं ने लेखक के साथ संवाद करते हुए पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर प्रश्न पूछे। इसके बाद आयोजित बुक साइनिंग सत्र में बड़ी संख्या में पाठकों ने लेखक से मुलाकात की और उनकी हस्ताक्षरित प्रतियां प्राप्त कीं।
कार्तिकेय वाजपेयी नई दिल्ली स्थित अधिवक्ता हैं और अपनी विधि संस्था के संस्थापक हैं। वे पूर्व राज्य स्तरीय क्रिकेट खिलाड़ी भी रह चुके हैं तथा वर्तमान में भारतीय अधिवक्ता क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता क्रिकेट विश्व कप में भाग लेते हैं। बौद्ध दर्शन, अद्वैत वेदांत, योग और ध्यान में उनकी गहरी रुचि उनकी लेखनी को विशिष्ट दार्शनिक दृष्टि प्रदान करती है।
‘वैली ऑफ वर्ड्स’ एक गैर-लाभकारी और स्वयंसेवकों द्वारा संचालित साहित्यिक पहल है, जिसने पिछले एक दशक में भारतीय साहित्य और कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह मंच देशभर के लेखकों, कलाकारों, आलोचकों, रंगकर्मियों और पाठकों को एक साथ लाकर भारतीय साहित्यिक परंपरा को समृद्ध करने और नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य कर रहा है।
Reported By: Arun Sharma











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