ऋषिकेश की पत्रकारिता के लिए बुधवार का दिन बेहद दुखद रहा। वरिष्ठ पत्रकार हरीश तिवारी का करीब 65 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके जाने से ऋषिकेश की पत्रकारिता में एक ऐसी रिक्तता पैदा हुई है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।
हरीश तिवारी ने करीब चार दशक तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई। 1980 और 1990 के दशकों से लेकर 21वीं सदी के शुरुआती दो दशकों तक उन्होंने ऋषिकेश की पत्रकारिता को अपनी सक्रियता, निर्भीकता और जनसरोकारों से समृद्ध किया। करीब पांच वर्ष पहले उन्होंने दैनिक जागरण, ऋषिकेश से पत्रकारिता का लंबा सफर पूरा किया और इसके बाद स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े रहे।
पत्रकारिता के दौरान उन्होंने कई युवा पत्रकारों का मार्गदर्शन भी किया। दैनिक जागरण में अपने साथ काम करने वाले युवा पत्रकार दुर्गा नौटियाल को उन्होंने ऋषिकेश का प्रभारी बनाया था। दुर्भाग्य से दुर्गा नौटियाल का भी कम उम्र में असमय निधन हो गया था। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे पत्रकार साथियों ने उस दौरान हरीश तिवारी से मुलाकात की थी। उस समय भी उनकी तबीयत कुछ नासाज नजर आई थी, लेकिन पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण और सक्रियता बरकरार थी।
पत्रकार हितों की आवाज उठाने वाले पत्रकार
हरीश तिवारी केवल समाचारों के संकलन और लेखन तक सीमित पत्रकार नहीं थे। वे ऋषिकेश के सार्वजनिक जीवन और पत्रकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर मुखर रहते थे। ऋषिकेश प्रेस क्लब के निर्माण और पत्रकारों के सार्वजनिक सरोकारों से जुड़े मामलों में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पत्रकारों के हित और सम्मान से जुड़े विषयों पर उनकी स्पष्ट राय होती थी और वह अपनी बात मजबूती से रखने के लिए जाने जाते थे।
कई दशकों तक ऋषिकेश और आसपास के सामाजिक, राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन को करीब से देखने वाले हरीश तिवारी अपने समय के घटनाक्रम के सक्रिय साक्षी रहे। उनके पास क्षेत्र की पत्रकारिता से जुड़ी ऐसी स्मृतियां और अनुभव थे, जो नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाएंगे।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता की समृद्ध विरासत
हरीश तिवारी को पत्रकारिता की विरासत भी अपने परिवार से मिली थी। उनके पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देवी प्रसाद तिवारी अल्मोड़ा से ऋषिकेश आकर बसे थे। टिहरी रियासत के जनआंदोलनों के इतिहास में भी देवी प्रसाद तिवारी का उल्लेख मिलता है।
11 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर में टिहरी राजशाही के खिलाफ आंदोलन के दौरान शहीद नागेंद्र सकलानी और उनके साथियों के संघर्ष से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं में देवी प्रसाद तिवारी की भूमिका दर्ज है। शहीद नागेंद्र सकलानी के पार्थिव शरीर को पहुंचाने वालों में देवी प्रसाद तिवारी और त्रेपन सिंह नेगी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उस दौर की ऐतिहासिक तस्वीरों और दस्तावेजों में भी देवी प्रसाद तिवारी की मौजूदगी दर्ज है।
पिता पर लिखी पुस्तक को लेकर जताया था आभार
हरीश तिवारी के निधन के बाद उनके पिता से जुड़ी एक पुरानी बातचीत भी याद की जा रही है। टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी और जखोली क्षेत्र के करीब दो-तीन सौ वर्षों के इतिहास पर तैयार की जा रही एक पुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देवी प्रसाद तिवारी का भी उल्लेख किया गया है। इस संबंध में सोशल मीडिया पर जानकारी साझा किए जाने के बाद हरीश तिवारी ने फोन कर आत्मीयता के साथ आभार जताया था।
उन्होंने कहा था कि उनके पिता के बारे में लिखकर उन्हें अमर कर दिया गया है और आने वाली पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराने के लिए उनका पूरा परिवार आभारी रहेगा। उस आत्मीय बातचीत को याद करते हुए अब उनके निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देना बेहद भावुक कर देने वाला क्षण है।
हरीश तिवारी ने भी अपनी पत्रकारिता के माध्यम से अपने समय का एक जीवंत दस्तावेज छोड़ा है। उन्होंने ऋषिकेश की पत्रकारिता के कई दौर देखे और उनमें सक्रिय भूमिका निभाई। उनके अनुभव, स्मृतियां और पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए संदर्भ का काम करेंगी।
पत्रकारिता के एक दौर का हुआ अवसान
हरीश तिवारी के निधन को केवल एक पत्रकार का निधन नहीं, बल्कि ऋषिकेश की पत्रकारिता के एक दौर का अवसान माना जा रहा है। वह दौर, जब पत्रकारिता को जुनून और जनसरोकारों से जुड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता था। खबरों के पीछे सक्रियता से जुटना और सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाना उनकी पत्रकारिता की पहचान रही।
वरिष्ठ पत्रकार हरीश तिवारी अपने पीछे पत्रकारिता की समृद्ध विरासत और अनगिनत स्मृतियां छोड़ गए हैं। उनके निधन से पत्रकारिता जगत में गहरा शोक है। ऋषिकेश की पत्रकारिता में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
Reported By: Arun Sharma












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