वक्त की रेत पर तकनीक ने अपनी जो छाप छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक भी है और चेतावनी भी। 13 अप्रैल 2026 की सुनहरी शाम दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में एक ऐसी ही बौद्धिक वैचारिकी की गवाह बनी, जहाँ सूचना क्रांति के नए युग का शंखनाद हुआ। अवसर था—पुस्तक ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ का लोकार्पण, जहाँ विशेषज्ञों ने न केवल शब्दों की शक्ति को सराहा, बल्कि भविष्य के उस ‘रोबो जर्नलिस्ट’ की आहट को भी महसूस किया, जो जल्द ही हमारे ड्राइंग रूम के संवादों का हिस्सा बनने वाला है।
एक वैचारिक सेतु: परंपरा और आधुनिकता का मिलन
समारोह की भव्यता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता था कि सभागार में विचारकों, साहित्यकारों और सूचना-शिल्पियों का एक ऐसा संगम उमड़ा था, जो यह समझने को आतुर था कि बदलते डिजिटल युग में ‘शब्द’ की साख क्या होगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं लेखक अनिल रतूड़ी ने अपनी बात एक दार्शनिक गंभीरता के साथ रखी। उन्होंने कहा: “मीडिया मात्र सूचनाओं का संवाहक नहीं, बल्कि वह समाज की आत्मा का निर्माता भी है। आज जब हम गैजेट आधारित पत्रकारिता के युग में जी रहे हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक अभिव्यक्ति के द्वार तो खोलती है, लेकिन वह सत्य की शुचिता की गारंटी नहीं देती। पत्रकारिता में मानवीय संवेदनशीलता और तकनीकी दक्षता के बीच एक ऐसा संतुलन चाहिए, जहाँ मशीन काम तो करे, पर उसका ‘विवेक’ हमेशा एक मनुष्य के हाथ में रहे। यदि हम तकनीक के दास बन गए, तो सूचना की गुणवत्ता और प्रभाव दोनों ही अपनी गरिमा खो देंगे।”
रोबो जर्नलिस्ट: भविष्य की एक अनिवार्य वास्तविकता
वरिष्ठ टीवी पत्रकार व नेटवर्क 18 के उत्तराखण्ड संपादक अनुपम त्रिवेदी ने डिजिटल युग की स्वतंत्रता और भविष्य के ‘रोबोटिक मीडिया’ पर एक साहसिक तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा: “वह दिन दूर नहीं जब समाचार कक्षों में एंकर की जगह एल्गोरिदम और रिपोर्टर की जगह रोबोट दिखाई देंगे। भविष्य का मीडिया ‘रोबो जर्नलिस्ट’ के हाथ में होगा, जो बिना थके डेटा का विश्लेषण करेगा, खबरें लिखेगा और उन्हें प्रसारित भी करेगा। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ‘अस्तित्व’ का है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पत्रकार को संस्थान के बंधन से तो मुक्त कर दिया है, पर क्या वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसे ‘सत्य’ के प्रति और अधिक जिम्मेदार बनाएगी? हमें गुणवत्ता और प्रमाणिकता के मानकों को फिर से परिभाषित करना होगा।”
मौलिकता पर संकट: योगेश भट्ट की तीखी टिप्पणी
समारोह में वैचारिक हलचल तब पैदा हुई, जब उत्तराखंड के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट ने पुस्तक की निर्माण प्रक्रिया पर ही सवाल उठा दिए। उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा: “आज हम न्यू मीडिया पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन इस पुस्तक के शुरुआती पन्ने ही यह बता रहे हैं कि इसे ‘चैट जीपीटी’ (ChatGPT) के निःशुल्क सब्सक्रिप्शन की मदद से लिखा गया है। जब लेखक अपनी मौलिक सोच ही मशीन को सौंप दे, तो यह वैचारिक पतन की पराकाष्ठा है।”
श्री भट्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा बताते हुए कहा कि यदि हमारी भाषा और तर्क मशीनें तय करने लगेंगी, तो पत्रकारिता समाज का दर्पण नहीं बल्कि केवल ‘प्रोग्राम्ड डेटा’ बनकर रह जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्रवृत्ति मानवीय चेतना और स्वतंत्र लेखन को पंगु बना रही है। उन्होंने ‘मीडिया साक्षरता’ को एक जनांदोलन बनाने की वकालत की, ताकि जागरूक पाठक फेक न्यूज और मशीनी सूचनाओं के इस मायाजाल को समझ सकें।
संस्थागत पत्रकारिता और डिजिटल क्रांति का द्वंद्व
दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रमुख डॉ. अनिल भारती ने आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे पारंपरिक माध्यमों के आधुनिक बदलावों पर चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि: “भविष्य का मीडिया आज के मीडिया से पूर्णतः भिन्न होगा। मानवीय हस्तक्षेप का दायरा संकुचित होता जा रहा है और एआई (AI) का प्रभुत्व बढ़ रहा है। सूचनाओं का प्रवाह तो हिमालय की बाढ़ की तरह तीव्र होगा, लेकिन उस प्रवाह में से शुद्ध और प्रमाणिक जल (सूचना) को छानना ही एक पत्रकार की असली परीक्षा होगी। सोशल मीडिया की आवश्यकता अब विकल्प नहीं, बल्कि पत्रकारिता की अनिवार्य शर्त बन चुकी है।” वहीं, डॉ. ताहा सिद्दीकी ने मीडिया संस्थानों और अकादमिक जगत के बीच बढ़ती दूरी पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यदि हमारे प्रशिक्षण संस्थान और मीडिया हाउस एक धरातल पर नहीं आए, तो हम केवल डिग्रीधारी बेरोजगार पैदा करेंगे, पत्रकार नहीं।
महामारी की मार और प्रिंट पत्रकारिता का संकट
वरिष्ठ पत्रकार संजीव कंडवाल ने पिछले दो दशकों के बदलावों का विश्लेषण करते हुए ‘इन्फोडेमिक’ (सूचनाओं की महामारी) पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि कोरोना काल ने हमें तकनीक के करीब तो ला दिया, लेकिन अब अफवाहें समाचारों का चोला ओढ़कर आ रही हैं, जिनका स्रोत ढूंढना लगभग नामुमकिन है। उनके अनुसार, आज के दौर में ‘फैक्ट-चेकिंग’ महज एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का अनिवार्य हथियार है। श्री कंडवाल ने प्रिंट मीडिया के अस्तित्व पर मंडराते संकट को रेखांकित करते हुए कहा आज प्रिंट का पत्रकार सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। डिजिटल की होड़ में हर टीवी चैनल और संस्थान का अपना फेसबुक पेज और सोशल मीडिया हैंडल है, जहाँ सूचनाएँ पलक झपकते ही प्रसारित हो जाती हैं। इस अंधी दौड़ में पारंपरिक पत्रकारिता की गहराई और ठहराव कहीं खो गए हैं, जिससे प्रिंट मीडिया के सामने अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी हो गई है।
डॉ. बी.के.एस. संजय की मार्मिक पुकार
पद्मश्री डॉ. बी.के.एस. संजय ने बच्चों के हाथों में थमे स्मार्टफोन को ‘दुधारी तलवार’ बताते हुए गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि तकनीक से अधिक खतरनाक इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक खतरों के प्रति हमारी अज्ञानता है। डॉ. संजय ने अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से मीडिया के नैतिक उत्तरदायित्वों को रेखांकित किया, जिससे पूरा सभागार गहरी संवेदना से भर उठा।
एआई: प्रतिरोधी नहीं, सहयोगी बने
चर्चा सत्र का पुस्तक के संपादक व संचालन कर रहे डॉ. सुशील उपाध्याय ने एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रति हमारे नजरिए को बदलने की बात कही। उन्होंने तर्क दिया: “एआई कोई ऐसा शत्रु नहीं है जिसे हम रोक सकें। यह एक लहर है, और लहर को रोका नहीं, बल्कि उसे पार करने के लिए कौशल सीखा जाता है। एआई हमारी पत्रकारिता की आत्मा—नैतिकता और रचनात्मकता—को कभी नहीं छीन सकता, बशर्ते हम अपनी मौलिक सोच को जीवित रखें। मशीनी दक्षता और इंसानी दिल का सामंजस्य ही भविष्य की पत्रकारिता का मंत्र है।” पुस्तक के सह-संपादक प्रो. योगेश कुमार योगी और डॉ. अजीत सिंह तोमर ने पुस्तक की संरचना पर प्रकाश डालते हुए बताया कि गैजेट आधारित पत्रकारिता ने अभिजात्य अवरोधों को तोड़ा है, लेकिन अब समय ‘डिजिटल अनुशासन’ सीखने का है।
विमर्श के दौरान एक और कड़वा सच उभरकर आया कि न्यू मीडिया के दौर में मनुष्य अपनी मौलिक सोच खोकर केवल एक ‘कैरियर’ बनकर रह गया है। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि व्हाट्सएप जैसे माध्यमों से व्यक्ति दूसरों के विचारों को बिना सोचे-समझे दूसरों पर थोप रहा है। बिना पुष्टि किए संदेशों को ‘फॉरवर्ड’ करने की अंधी दौड़ ने मानवीय विवेक को सुप्त कर दिया है।
समारोह में यह बात प्रमुखता से रेखांकित की गई कि सूचना की गति जितनी तीव्र है, उसकी सत्यता और निष्ठा उतनी ही संदिग्ध है। निष्कर्ष यही रहा कि डिजिटल युग में ‘फैक्ट-चेक’ अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी है; वरना तकनीक लोकतंत्र को सशक्त करने के बजाय केवल भ्रम फैलाने का जरिया बनकर रह जाएगी।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. भारती मिश्रा ने अपनी सहज और सुसंस्कृत वाणी से किया, जबकि स्वागत और आभार ज्ञापन चंद्रशेखर तिवारी ने दिया। समारोह में उत्तराखंड की प्रशासनिक और बौद्धिक जगत की विभूतियाँ—मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी, पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पांडे, कथाकार जितेन ठाकुर , उच्च शिक्षा की पूर्व निदेशक डॉ. सविता मोहन , और डॉ. सुधा जुगराण , उत्तरांचल प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री अजय राणा, डॉ. संजय मोहन, विभूति भूषण भट्ट, अरविन्द शेखर, जितेन्द्र अंथवाल, वरिष्ठ कवि सोमवारी लाल उनियाल, प्रेम पंचोली, रजनीश त्रिवेदी, जगमोहन मेंहदी रत्ता, भारत रावत, डॉ. डी. के. पाण्डे, शिव मोहन सिंह, प्रवीण भट्ट, डॉ. लालता प्रसाद, डॉ शिखा मिश्रा, सुंदर सिंह बिष्ट, मनोज इस्टवाल सहित दर्जनों विद्वानों की उपस्थिति ने इस विमर्श को एक राष्ट्रीय ऊँचाई प्रदान की।
लोकार्पण समारोह का समापन एक गहरे बोध के साथ हुआ—कि भविष्य भले ही मशीनों और एल्गोरिदम का हो, लेकिन दुनिया को बदलने वाली कहानी हमेशा एक ‘मनुष्य’ ही लिखेगा। ‘न्यू मीडिया के विविध आयाम’ पुस्तक आने वाले समय में एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ की तरह कार्य करेगी, जो नई पीढ़ी के पत्रकारों को तकनीक के घने जंगल में रास्ता दिखाएगी। यह आयोजन देहरादून के साहित्यिक इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर दर्ज हो गया। यह पुस्तक आने वाले समय में न्यू मीडिया के शोधार्थियों के लिए एक मशाल का काम करेगी।
Reported By: Shishpal Gusain












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