देहरादून: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष अब एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। प्रदेश में बाघ, गुलदार (चीता) और भालू (रीछ) के बढ़ते हमलों और जानमाल के नुकसान पर उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने गहरी चिंता व्यक्त की है। सरकार की नीतियों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि आज पहाड़ में मनुष्य का जीवन जानवरों से भी सस्ता हो गया है और राज्य सरकार मासूमों व आम जनता की जान बचाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
मुआवजे पर खिंचाई और वन अधिनियम में ढील की मांग
यूकेडी अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि वे वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन जनता की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने बेहद जरूरी हैं। सरकार पर आरोप लगाते हुए उन्होंने निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं:
मुआवजे के नाम पर खानापूर्ति: सरकार वन्यजीवों के हमले में जान गंवाने वाले परिवारों को सिर्फ 5 लाख रुपये का मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है, जो कि बेहद शर्मनाक है।
बच्चों और आम लोगों पर बढ़ते हमले: पिछले कुछ सालों में जंगली जानवरों के हमले काफी बढ़ गए हैं, जिसमें मासूम बच्चे और ग्रामीण लगातार निवाला बन रहे हैं, लेकिन सरकार इस दिशा में गंभीर नहीं है।
कानूनों में ढील की जरूरत: जब तक वन अधिनियम 1980 (Forest Act) जैसे पुराने और कड़े कानूनों में व्यावहारिक ढील नहीं दी जाती, तब तक वन्यजीवों के इस बढ़ते आतंक पर नियंत्रण पाना नामुमकिन है।
पहाड़ियों के जीवन का गलत आकलन: सरकार ने पहाड़ के जनमानस का आकलन वन्यजीवों से भी कम आंका है, जहां जानवर की जान की कीमत ज्यादा और मनुष्य के जीवन की कम रह गई है, जो कि बेहद गंभीर सोच का विषय है।
जनता की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील
सुरेंद्र कुकरेती ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि पहाड़ की जनता आज अपने ही घरों और खेतों में सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है। उत्तराखंड क्रांति दल ने मांग की है कि सरकार केवल कागजी दावों और नाममात्र के मुआवजे से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस सुरक्षा उपाय करे। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने जल्द ही वन अधिनियमों में संशोधन के लिए केंद्र पर दबाव नहीं बनाया और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की, तो उक्रांद सड़कों पर उतरकर जन आंदोलन के लिए बाध्य होगा।
Reported By: Rajesh Kumar













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