उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास से जुड़े बहुचर्चित रामपुर तिराहा कांड में अदालत ने 32 वर्ष बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच के दौरान झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने और गलत आरोप गढ़ने के मामले में तीन पुलिसकर्मियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई है। अदालत के इस फैसले के साथ एक बार फिर जांच के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं।
मामला 1 अक्तूबर 1994 की उस रात से जुड़ा है, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों के साथ मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर बर्बरता हुई थी। इस घटना ने पूरे आंदोलन को नई दिशा दी थी और लंबे समय तक न्याय की मांग उठती रही।
सीबीआई जांच के दौरान सामने आया कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने देहरादून में खड़ी एक जीप को बागोवाली में मौजूद बस बताकर उससे खुखरी बरामद होने का दावा किया था। हालांकि अदालत में जीप मालिक राजेंद्र कुमार की गवाही महत्वपूर्ण साबित हुई। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि जिस दूसरे पंजीकरण नंबर वाली बस का उल्लेख किया गया था, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं मिला। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने तीनों पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए डेढ़-डेढ़ साल की सजा सुनाई।
हालांकि अदालत के फैसले के बावजूद राज्य आंदोलनकारियों और कई जनप्रतिनिधियों ने इसे पर्याप्त नहीं माना है। राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष सुभाष बर्थ्वाल ने कहा कि दोषियों को अधिक कठोर सजा मिलनी चाहिए थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करेगी और राज्य आंदोलनकारी भी दोषियों को आजीवन कारावास दिलाने की मांग करेंगे।
वहीं भाजपा विधायक विनोद चमोली ने कहा कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण आंदोलनकारियों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। ऐसे में उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए दोषियों को और कड़ी सजा दिलाने के लिए हरसंभव कानूनी प्रयास किए जाने चाहिए।
अदालत के इस फैसले ने तीन दशक पुराने मामले में न्यायिक प्रक्रिया को एक नया पड़ाव दिया है, लेकिन राज्य आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि उन्हें अभी भी पूर्ण न्याय का इंतजार है।
सुभाष बर्थ्वाल, उपाध्यक्ष, राज्यांदोलनकारी सम्मान परिषद्
विनोद चमोली, विधायक, भाजपा
Reported By: Praveen Bhardwaj












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