
उत्तराखंड के रामनगर तहसील के आपदा प्रभावित चुकुम गांव के ग्रामीणों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। पिछले कई दशकों से कोसी नदी के कटाव और बाढ़ का दंश झेल रहे ग्रामीणों के विस्थापन को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर विस्थापन के लिए चिह्नित वन भूमि हस्तांतरण से संबंधित प्रस्ताव केंद्र सरकार के परिवेश पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, केंद्र सरकार की सक्षम समिति को प्रस्ताव अपलोड होने के तीन महीने के भीतर नियमानुसार निर्णय लेने को कहा है। इससे वर्षों से सरकारी फाइलों में अटकी विस्थापन प्रक्रिया को आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है।
दरअसल, चुकुम गांव के विस्थापन की मांग वर्ष 1993 से उठती आ रही है, लेकिन तीन दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद ग्रामीणों को सुरक्षित ठिकाना नहीं मिल पाया है। इस मामले में ग्रामीण गंगा सिंह नेगी, जस्सीराम सहित अन्य लोगों ने जनहित याचिका दायर कर न्यायालय से पुनर्वास की मांग की थी। सुनवाई के दौरान ग्रामीणों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने अदालत को बताया कि कोसी नदी के लगातार कटाव के कारण गांव की करीब 60 से 70 प्रतिशत भूमि नदी में समा चुकी है।
भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट में भी इस क्षेत्र को मानवीय बसावट के लिए असुरक्षित बताया गया है। बरसात के दौरान कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से गांव का संपर्क मुख्य क्षेत्र से कट जाता है। ऐसे में ग्रामीणों को आवागमन के साथ ही जान-माल की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि चुकुम गांव में कुल 97 परिवार निवास करते हैं। इनमें अनुसूचित जाति के 45 और सामान्य श्रेणी के 52 परिवार शामिल हैं। पुनर्वास प्रस्ताव के अनुसार वैध भूमि स्वामियों को दूसरी जगह समान क्षेत्रफल की भूमि उपलब्ध कराने की योजना है, जबकि अनधिकृत रूप से रह रहे परिवारों को आवासीय उद्देश्य से 250 वर्ग मीटर भूमि देने का प्रस्ताव है।
सरकार की ओर से पुनर्वास के लिए रामनगर वन प्रभाग की आमपोखरा रेंज में प्लॉट संख्या 50 की करीब 45 हेक्टेयर वन भूमि चिह्नित की गई है। हालांकि, वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया लंबित होने के कारण अब तक विस्थापन की योजना धरातल पर नहीं उतर पाई है। इससे पहले हाथीडंगर क्षेत्र में भी विस्थापन के लिए भूमि चिह्नित किए जाने की चर्चा सामने आई थी, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
चुकुम गांव की भौगोलिक स्थिति भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के नजदीक होने के कारण यहां मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बना रहता है। दूसरी ओर, हर साल बरसात में बाढ़ और भू-कटाव के चलते ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर रहना पड़ता है।
अब हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य के वन सचिव को चार सप्ताह के भीतर वन भूमि डायवर्जन का प्रस्ताव परिवेश पोर्टल पर अपलोड करने और केंद्र सरकार की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति को इसके बाद तीन महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार को चुकुम और अमरपुर के प्रभावित निवासियों के पुनर्वास के लिए बिना देरी प्रभावी कदम उठाने को भी कहा है।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद 1993 से विस्थापन की राह देख रहे ग्रामीणों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। हालांकि, अब असली चुनौती निर्धारित समयसीमा में वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी कर पुनर्वास को धरातल पर उतारने की होगी। ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार उन्हें बाढ़ और कोसी नदी के कटाव के खतरे से स्थायी निजात मिल सकेगी।
दुष्यंत मैनाली,
अधिवक्ता, उत्तराखंड हाईकोर्ट
Reported By: praveen Bhardwaj













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