वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत केंद्रीय रेशम बोर्ड के केंद्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, सहसपुर में “आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह” का उद्घाटन किया गया। इस अवसर पर तकनीकी संवाद कार्यक्रम का भी आयोजन हुआ। पहल का उद्देश्य रेशम उत्पादक किसानों को वैज्ञानिक, किफायती और अनुकूल पालन वातावरण उपलब्ध कराना तथा रेशम उत्पादन को अधिक लाभकारी बनाने के लिए तकनीकी समाधान विकसित करना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. कमल किशोर पंत, निदेशक आईआईटी रुड़की सहित अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलन एवं राष्ट्रगीत के साथ किया। इसके बाद अतिथियों ने नव-निर्मित आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह का लोकार्पण किया। कार्यक्रम में रेशमकीट पालन में वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग, तापमान एवं आर्द्रता नियंत्रण तथा किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने में मॉडल की संभावित भूमिका पर चर्चा की गई।
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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने युवाओं को रेशम उत्पादन के क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं से अवगत कराते हुए आधुनिक तकनीक के साथ रेशमकीट पालन अपनाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य के बेहतर स्वास्थ्य और विकास के लिए पौष्टिक भोजन जरूरी है, उसी प्रकार रेशमकीटों के समुचित विकास और गुणवत्तापूर्ण कोकून उत्पादन के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शहतूत की पत्तियां आवश्यक हैं। उन्होंने पालन गृह के आंतरिक वातावरण और तापमान नियंत्रण को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह मॉडल रेशमकीटों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने में सहायक हो सकता है। उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा के खूंट ग्राम में आईआईटी रुड़की द्वारा करीब एक लाख शहतूत के पौधों का रोपण भी किया गया है।
रेशम निदेशालय उत्तराखंड के निदेशक प्रदीप कुमार ने कहा कि सतत विकास के लिए रेशमकीट पालन को किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस मॉडल की सहायता से किसान वर्ष में एक से अधिक फसल ले सकेंगे, जिससे उत्पादन और आय बढ़ने की संभावनाएं मजबूत होंगी। किसानों की आय में निरंतर वृद्धि करना प्रमुख उद्देश्य है और बहुफसली रेशमकीट पालन इस दिशा में प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है।
वहीं, केंद्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, पाम्पोर के निदेशक डॉ. एन. शक्तिवेल ने रेशमकीटों के पोषण और मौसमी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में तापमान और नमी में बदलाव का असर रेशमकीटों के विकास, कोकून की गुणवत्ता और उत्पादन पर पड़ सकता है। वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किया गया पालन गृह तापमान एवं नमी को अनुकूल बनाए रखने में मददगार होगा।
कार्यक्रम के दौरान किसानों एवं लाभार्थियों को पालन गृह की तकनीकी विशेषताओं का सजीव प्रदर्शन भी किया गया। डॉ. इरफान इलाही, वैज्ञानिक-डी ने इसकी संरचना, तापमान एवं आर्द्रता नियंत्रण तथा रेशमकीट पालन में इसकी उपयोगिता की जानकारी दी। प्रदर्शन के आयोजन एवं समन्वय में डॉ. ई. अरसाकुमार और डॉ. साक्षी वैष्णव का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
कार्यक्रम में आईआईटी रुड़की के प्रो. अक्षय द्विवेदी एवं उनकी तकनीकी टीम के साथ केंद्रीय रेशम बोर्ड के विभिन्न केंद्रों के प्रभारी अधिकारी तथा रेशम निदेशालय के अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे। मुख्य अतिथि एवं अन्य गणमान्य अतिथियों को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।
क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, सहसपुर के प्रमुख डॉ. पवन सैनी ने बताया कि आदर्श एवं किफायती रेशमकीट पालन गृह की अवधारणा केंद्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, पाम्पोर के पूर्व निदेशक डॉ. सरदार सिंह द्वारा प्रस्तुत की गई थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि कम लागत वाले इस वैज्ञानिक मॉडल को अपनाने से रेशम उत्पादकों को बेहतर पालन सुविधाएं मिलेंगी तथा उत्पादन की गुणवत्ता और उत्पादकता में वृद्धि होगी।
कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि एवं अधिकारियों ने केंद्र परिसर स्थित सेरी-म्यूजियम का भ्रमण कर रेशम उत्पादन से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अवलोकन किया। इसके साथ ही परिसर में पौधारोपण भी किया गया।
यह पहल वैज्ञानिक तकनीक को किसानों की व्यावहारिक जरूरतों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे रेशमकीट पालन को अधिक किफायती एवं वैज्ञानिक बनाने के साथ किसानों की उत्पादकता और आय बढ़ाने की संभावनाओं को बल मिलने की उम्मीद है।
Reported By: Arun Sharma












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