कोटद्वार में आयोजित भव्य सैनिक सम्मान समारोह के दौरान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण शोधपरक पुस्तक “कण्वाश्रम- भरत से भारतवर्ष” का लोकार्पण किया गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शोधकर्ता मनोज इष्टवाल द्वारा लिखित इस पुस्तक का विमोचन विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खण्डूड़ी, पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी, कोटद्वार के मेयर शैलेन्द्र रावत तथा लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. नेगी ने संयुक्त रूप से किया।
समारोह में मौजूद अतिथियों ने लेखक मनोज इष्टवाल के शोध कार्य की सराहना करते हुए इसे भारतीय इतिहास और संस्कृति को नई दृष्टि से प्रस्तुत करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि यह पुस्तक देश के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि कण्वाश्रम केवल उत्तराखंड की धरोहर नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक पहचान का उद्गम स्थल है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में प्रस्तुत शोध और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर पर्यटन विभाग कण्वाश्रम को वैश्विक सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य करेगा।
सतपाल महाराज ने कहा, “मनोज इष्टवाल जी ने इस शोध के माध्यम से हमारी आने वाली पीढ़ियों पर बड़ा उपकार किया है। कण्वाश्रम का इतिहास भारतवर्ष की पहचान से जुड़ा हुआ है और इसे विश्व पटल पर स्थापित करने का समय आ गया है।”
विधानसभा अध्यक्ष एवं कोटद्वार की विधायक ऋतु भूषण खण्डूड़ी ने कहा कि कण्वाश्रम और कोटद्वार का गौरवशाली इतिहास हर उत्तराखंडी के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने आश्वासन दिया कि कण्वाश्रम के संरक्षण, विकास और इसके ऐतिहासिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे।
लेखक मनोज इष्टवाल ने बताया कि यह पुस्तक वर्षों के गहन अध्ययन, प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों और स्थानीय लोककथाओं के आधार पर तैयार की गई है। पुस्तक में कण्वाश्रम के ऐतिहासिक महत्व, चक्रवर्ती सम्राट भरत के जन्मस्थल के रूप में इसकी पहचान तथा भारतवर्ष नाम की उत्पत्ति से जुड़े तथ्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
उन्होंने कहा कि पुस्तक का उद्देश्य केवल इतिहास को प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और विरासत से जोड़ना भी है।
समारोह में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने इस पुस्तक को उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश की ऐतिहासिक धरोहर को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान बताया।












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