आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में नेतृत्व हासिल करना भी है। इस दिशा में फुटवियर उद्योग एक ऐसा क्षेत्र बनकर उभर रहा है, जिसमें भारत के पास अपार संभावनाएं हैं। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फुटवियर उत्पादक है, लेकिन वैश्विक निर्यात में उसकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित है—यही अंतर हमें सुधार की दिशा दिखाता है।
फुटवियर हमारे रोजमर्रा के जीवन का अहम हिस्सा है—चाहे वह स्कूल जाने वाले बच्चे हों, लंबे समय तक काम करने वाले मजदूर, डिलीवरी कर्मी या पेशेवर एथलीट। ऐसे में उपभोक्ताओं की मांग अब केवल कीमत तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि वे आराम, टिकाऊपन, हल्केपन और बेहतर प्रदर्शन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
यहीं पर टेक्निकल टेक्सटाइल (तकनीकी वस्त्र) की भूमिका निर्णायक हो जाती है। ये विशेष प्रकार की सामग्रियां होती हैं, जो जूतों को अधिक आरामदायक, मजबूत, लचीला और हवादार बनाती हैं। आगरा जैसे पारंपरिक फुटवियर हब में पहले से ही इनका उपयोग हो रहा है, हालांकि कई निर्माता इसे औपचारिक रूप से टेक्निकल टेक्सटाइल के रूप में नहीं पहचानते।
वैश्विक स्तर पर फुटवियर उद्योग का आकार लगभग 500 बिलियन डॉलर का है, जिसमें हर साल करीब 23.9 बिलियन जोड़ी जूते बनते हैं। भारत इसमें लगभग 12.5% योगदान देता है, लेकिन निर्यात में हिस्सेदारी सिर्फ 2% है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि दुनिया के 86% फुटवियर नॉन-लेदर (गैर-चमड़ा) होते हैं, जबकि भारत अब भी मुख्यतः चमड़े पर केंद्रित है।
देश के भीतर भी बाजार तेजी से बदल रहा है। 2025 तक भारतीय फुटवियर बाजार का आकार 20.67 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। जैसे-जैसे आय बढ़ेगी, उपभोक्ता बेहतर गुणवत्ता और डिजाइन वाले उत्पादों की ओर बढ़ेंगे। खासकर स्नीकर सेगमेंट में तेज़ वृद्धि देखी जा रही है, जहां आराम और स्टाइल का मेल सबसे ज्यादा मायने रखता है।
सरकार भी इस बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए “स्मार्ट, टिकाऊ और निर्बाध” फ्रेमवर्क पर काम कर रही है।
- स्मार्ट फुटवियर: एआई, डिजिटल डिजाइन और फुट स्कैनिंग से व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार जूते बनाना संभव हो रहा है।
- टिकाऊ (Sustainable): रीसाइक्ल्ड प्लास्टिक और बायोडिग्रेडेबल फाइबर का उपयोग बढ़ रहा है।
- निर्बाध विनिर्माण: 3डी निटिंग जैसी तकनीकें उत्पादन को तेज और किफायती बना रही हैं।
भारत का फुटवियर उद्योग पहले से ही 20 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है, जिनमें लगभग 50% महिलाएं हैं। कानपुर, चेन्नई, कोलकाता जैसे प्रमुख क्लस्टर इस क्षेत्र की रीढ़ हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि फुटवियर उद्योग में पहले से मौजूद टेक्निकल टेक्सटाइल के उपयोग को पहचानकर उसे व्यवस्थित और विस्तार दिया जाए। इससे न केवल नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि निर्यात में भी तेजी आएगी और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
अंततः, भारत की वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनने की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पारंपरिक उद्योगों और आधुनिक तकनीकों का कितना प्रभावी संगम कर पाता है। फुटवियर उद्योग इसी संगम का एक मजबूत उदाहरण है—और टेक्निकल टेक्सटाइल वह धागा है, जो इस संभावना को एक बड़ी सफलता की कहानी में बदल सकता है।
Shri Giriraj Singh













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