
देवभूमि उत्तराखंड की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरा पर स्थित परमार्थ निकेतन में भारतीय कला, संगीत, नृत्य और सनातन संस्कृति के अनूठे संगम ‘कला प्रवाह : ए सीरीज ऑफ टेम्पल फेस्टिवल्स’ का भव्य शुभारंभ हुआ। संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की ओर से उत्तराखंड सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय महोत्सव में भारतीय कला की समृद्ध परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक विविधता की शानदार झलक देखने को मिली।
महोत्सव का शुभारंभ परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमारों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार और सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ के साथ हुआ। इसके बाद संगीत नाटक अकादमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित हिमांशु डामोरा ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध लोक गायिका हेमा नेगी करासी ने भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया।
शंखनाद के बीच परमार्थ निकेतन के पीठाधीश्वर स्वामी चिदानंद सरस्वती और साध्वी भगवती सरस्वती का स्वागत किया गया। इसके बाद विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में दीप प्रज्वलित कर महोत्सव का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय और पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात लोक गायिका एवं संगीत नाटक अकादमी की शासी परिषद की सदस्य डॉ. बसंती बिष्ट सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में महाराष्ट्र के रतन मोहन शर्मा ने हवेली संगीत की प्रस्तुति दी, जबकि दिल्ली के कथक केंद्र के कलाकारों ने ‘नमामि गंगे’ विषय पर आधारित कथक नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। शास्त्रीय संगीत और नृत्य की इन प्रस्तुतियों ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और मां गंगा की महिमा को कलात्मक रूप में प्रदर्शित किया।
इस दौरान स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि भारत की कला, संगीत और संस्कृति देश की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि साधना, संस्कार और ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है। जब संगीत में भक्ति, नृत्य में भाव और कला में आध्यात्मिकता का समावेश होता है, तब वह समाज में सद्भाव और एकता स्थापित करने का माध्यम बन जाती है। उन्होंने कहा कि मां गंगा की पावन धारा की तरह भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं भी निरंतर प्रवाहित रहनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत से जुड़ी रहें।
साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि कला की न कोई भाषा होती है और न कोई सीमा। यह सीधे हृदय से संवाद करती है। संगीत, नृत्य और भक्ति मनुष्य को आंतरिक शांति और एकत्व से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ कलाकारों को अपनी प्रतिभा और साधना प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करते हैं।
दो दिवसीय महोत्सव में विभिन्न राज्यों के कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। इनमें हेमा नेगी करासी के उत्तराखंडी भजन, रतन मोहन शर्मा का हवेली संगीत, कथक केंद्र दिल्ली की ‘नमामि गंगे’ प्रस्तुति, सुचित्रा बालासुब्रमण्यम की हरिकथा, पतंजलि विश्वविद्यालय उत्तराखंड की ओर से भरतनाट्यम एवं कथक तथा पश्चिम बंगाल के कार्तिक दास बाउल की बाउल संगीत प्रस्तुति प्रमुख हैं। इसके साथ ही परमार्थ निकेतन के ऋषिकुमारों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार भी महोत्सव का विशेष आकर्षण रहा।
‘कला प्रवाह’ महोत्सव भारतीय कला की विविध परंपराओं, मंदिर संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को एक साझा मंच पर लाने की महत्वपूर्ण पहल है। गंगा के पावन सान्निध्य में आयोजित यह आयोजन न केवल कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दे रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं से जोड़ने का संदेश भी दे रहा है।
Reported By: Arun sharma












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