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ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं शैक्षिक संवाद का आयोजन हुआ, जिसमें केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी और उनकी धर्मपत्नी प्रो. शिवानी वी. जी. ने सहभाग किया। इस अवसर पर दोनों विद्वानों ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया और संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति तथा शिक्षा के विभिन्न आयामों पर गहन चर्चा की।
बैठक के दौरान संस्कृत गुरूकुलों के पुनरुत्थान, कन्या गुरूकुलों की स्थापना और संस्कृत भाषा के व्यापक प्रसार जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संस्कृत को आम जन तक सुलभ बनाने और आधुनिक तकनीक के साथ पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर भी विचार-विमर्श हुआ। यह चर्चा इस दिशा में केंद्रित रही कि किस प्रकार भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित किया जा सकता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कन्या गुरूकुलों की स्थापना पर विशेष बल देते हुए कहा कि मातृ शक्ति ही संस्कारों की आधारशिला है। उन्होंने कहा, “यदि माँ संस्कारी है तो पूरा समाज संस्कारी होगा।” उन्होंने बालिकाओं की शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार बताते हुए कन्याओं के लिए आयुर्वेदिक गुरूकुल स्थापित करने का सुझाव दिया, जहां वे संस्कृत, वेद, योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा का समग्र अध्ययन कर सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की आत्मा है, जो मानवता को जोड़ने का कार्य करती है। संस्कृत को आधुनिक तकनीक से जोड़कर युवाओं तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है, जिससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके।
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों ने परमार्थ निकेतन की विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग लिया। इस पावन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने अतिथियों को रुद्राक्ष का पौधा भेंट कर सम्मानित किया।
यह आयोजन भारतीय संस्कृति, शिक्षा और अध्यात्म के समन्वित विकास की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
Reported By: Arun sharma












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