असम में हाल ही में आई भीषण बाढ़ से कई गांव प्रभावित हुए हैं। जोरहाट जिले के तिताबोर स्थित जुनाकीमंडल गांव भी बाढ़ की चपेट में आया। यह गांव CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के तहत चयनित गांवों में शामिल है। बाढ़ से गांव के आवासीय भवनों, ग्रामीण आधारभूत ढांचे और आवश्यक सामुदायिक सुविधाओं को नुकसान पहुंचा। इसके बाद CSIR-CBRI की बहुविषयक टीम ने गांव का दौरा कर नुकसान का वैज्ञानिक आकलन किया और आपदा-रोधी पुनर्वास के लिए तकनीकी समाधान सुझाए।
बाढ़ प्रभावित भवनों का किया वैज्ञानिक सर्वेक्षण
CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के उद्देश्यों के अनुरूप मिशन निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार रमनचारला और मिशन के नोडल वैज्ञानिक डॉ. किशोर एस. कुलकर्णी के मार्गदर्शन में CSIR-CBRI की टीम को जुनाकीमंडल भेजा गया।
टीम में डॉ. चंदन स्वरूप मीणा, डॉ. आर. शिव चिदंबरम, आर्किटेक्ट निशा, डॉ. सुमित, सुश्री अरुंधती, श्री अनुज और श्री प्रीतम शामिल रहे। टीम ने गांव में विस्तृत सर्वेक्षण कर बाढ़ से प्रभावित भवनों में हुए संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक नुकसान का आकलन किया।
सर्वेक्षण के दौरान भवनों के कमजोर और संवेदनशील हिस्सों की पहचान की गई। इसके आधार पर मौजूदा भवनों की सुरक्षा और मजबूती के लिए मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण से जुड़े उपाय सुझाए गए।
PMAY-G लाभार्थियों के लिए तकनीकी जागरूकता कार्यक्रम
सर्वेक्षण के बाद जुनाकीमंडल में “आवास सक्षम: PMAY-G लाभार्थियों के लिए तकनीकी जागरूकता एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शन” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के लाभार्थियों के लिए सुरक्षित, किफायती, टिकाऊ और आपदा-रोधी ग्रामीण आवास को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम में 150 से अधिक लोगों ने भाग लिया। क्षेत्र की बाढ़ और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए भवन मरम्मत एवं रेट्रोफिटिंग, प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल, नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर, फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ और बांस से निर्मित सुरक्षित एवं टिकाऊ आवास जैसी तकनीकों पर विशेष जोर दिया गया।
75 प्रतिशत तक ऊर्जा बचत वाली सोलर तकनीक का प्रदर्शन
कार्यक्रम में CSIR-CBRI द्वारा विकसित विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इनमें हाइब्रिड सोलर वॉटर हीटिंग एवं स्पेस कंडीशनिंग टेक्नोलॉजी प्रमुख रही।
डॉ. चंदन स्वरूप मीणा की ओर से विद्यालय और आंगनवाड़ी भवनों के लिए ऊर्जा-कुशल सोलर-असिस्टेड हाइब्रिड तकनीक के उपयोग का समाधान प्रस्तावित किया गया। इसके जरिए गर्म पानी की उपलब्धता, कक्षाओं में तापीय आराम और रसोई संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
CSIR-CBRI के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में 75 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत कर सकती है। इससे ग्रिड बिजली और पारंपरिक तापन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। अनियमित बिजली आपूर्ति वाले ग्रामीण और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए इसे उपयोगी एवं टिकाऊ समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।
यह प्रणाली CSIR-CBRI रुड़की में स्वदेशी रूप से विकसित और सत्यापित की गई है। इसे कल्पा, किन्नौर और ITBP, लेह-लद्दाख में भी स्थापित किया जा चुका है।
पोर्टेबल मशीन से स्थानीय स्तर पर बनेंगे ईंट और ब्लॉक
गांव में पोर्टेबल ईंट-ब्लॉक निर्माण मशीनों का भी प्रदर्शन किया गया। करीब 100 से 125 किलोग्राम वजन वाली इन मशीनों को स्थानीय सामग्री के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। मशीनें मैनुअल और बिजली दोनों माध्यमों से संचालित हो सकती हैं।
इनसे आठ घंटे में करीब 800 से 1,000 ब्लॉक या 1,800 से 2,400 ईंटें तैयार की जा सकती हैं। दावा है कि यह क्षमता मैनुअल उत्पादन की तुलना में करीब 3 से 4 गुना अधिक है। मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम के गांवों में इस तकनीक का प्रदर्शन किया जा रहा है, जिससे स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री उपलब्ध कराने के साथ रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
बाढ़ के बाद इनडोर एयर क्वालिटी के लिए एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में स्टैंडअलोन एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम तैनात करने का प्रस्ताव भी है। इसका उद्देश्य बंद अथवा सीमित वेंटिलेशन वाले स्थानों में हवा के कीटाणुशोधन में सहायता करना है।
बाढ़ के बाद घरों और सामुदायिक भवनों में इनडोर एयर क्वालिटी से जुड़ी संभावित चिंताओं को देखते हुए यह प्रणाली उपयोगी हो सकती है। इस तकनीक का प्रस्ताव और विकास डॉ. तबिश, वैज्ञानिक की ओर से किया गया है।
राजमिस्त्रियों और निर्माण श्रमिकों को दिया जाएगा प्रशिक्षण
CSIR-CBRI की ओर से गांव और आसपास के क्षेत्रों के राजमिस्त्रियों एवं निर्माण श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करने की योजना भी बनाई गई है। इसका उद्देश्य स्थानीय श्रमिकों को सुरक्षित और वैज्ञानिक निर्माण तकनीकों से परिचित कराना है।
प्रशिक्षण के जरिए आधुनिक निर्माण पद्धतियों का व्यावहारिक ज्ञान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने और भविष्य में आपदा-रोधी निर्माण क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।
‘लैब से धरातल’ तक पहुंचेंगी वैज्ञानिक तकनीकें
CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के तहत जुनाकीमंडल में की गई यह पहल “प्रयोगशाला से धरातल” तक वैज्ञानिक एवं तकनीकी समाधानों को पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बाढ़ प्रभावित समुदायों के लिए सुरक्षित आवास, ऊर्जा दक्षता, स्थानीय निर्माण क्षमता और दीर्घकालिक आपदा-रोधी क्षमता विकसित करने पर फोकस किया जा रहा है।
इन तकनीकी हस्तक्षेपों के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक नवाचारों के व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही, यह पहल विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
Reported By: Arun Sharma












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